हिंसा की बढती प्रवृति

जून, 2025

अनीता मिश्रा
न्यू अशोक नगर, न्यू दिल्ली


हिंसा, नफरत, क्रोध, इर्ष्या और द्वेष ये सभी भाव संवेग का प्रतिफल है। ऐसी धारणा थी पहले! लेकिन आधुनिक समय में हिंसा एक सोची समझी साजिश भी है जिसे हथियार के रूप में प्रयोग किया जाता है। ऐसे हिंसक प्रवृत्ति के लोग समाज के लिए, मानवता के लिए, कोरोनावायरस से भी ज्यादा खतरनाक होते हैं। हिंसा केवल शारीरिक ही नहीं हो रही है बल्कि मानसिक हिंसा आधुनिक समय में ज्यादा बढ़ गयी है। दिखावे की होड़ में लोग दूसरों को फंसाने के लिए स्वयं की हत्या करने से भी पीछे नहीं हटते हैं।
बहुत सी परिस्थितियां ऐसी होती है जहाँ मानसिक यातनाओं से तंग आकर लोग अपने आप को खत्म कर लेते हैं। या दूसरों को मार देते हैं। इस समय हम सभी बहुत ही खतरनाक और जहरीले माहौल से गुजर रहे हैं। लगता है मशीनी युग में रहकर हम भी मशीन ही बनते जा रहे हैं। जहां किसी की दुख- दर्द, संवेदना, सहानुभूति, विवेक का कोई स्थान ही नहीं है। कोई किसी को सुनने और समझने को तैयार ही नहीं है। संस्कार मर्यादा नैतिकता सभी का लोप हो रहा है। कहीं शांति नहीं है सब अशांत है। परिवार घर संसार सभी तबाह हो रहे है। हमारे जीवन शैली का धागा ही उलझ गया है। सोशल मीडिया पर चाहे हम अपने आप को जितना भी खुश दिखा लें लेकिन अंदर से हम उतने ही सर रहे हैं। ऐसी स्थिति में हम क्या देंगें वर्तमान पीढ़ी को और क्या देंगे भावी पीढ़ी को। हम संवेदना विहीन रोबोट बनते जा रहे हैं।
इसके बहुत से कारण है
शहरीकरण
शहरीकरण के कारण संयुक्त परिवार पूरी तरह से बिखर गया।
शहर में रहकर बच्चे वह आचरण और व्यवहार नहीं सीख पाते हैं जो एक संयुक्त परिवार में बच्चे स्वत: सीख जाते थे। संयुक्त परिवार बच्चों के लिए वरदान थे।
बड़ों से कैसे बात करें, बड़ों का देखभाल उनके व्यवहार में स्वत: आ जाता था। समय सारणी के साथ ही जीवनचर्या के नियम बन जाते थे। जिससे उनके आचरण शुद्ध और व्यवहार सही हो जाते थे और वही व्यवहार आगे चलकर संस्कार बन जाता था। घर के बड़े बुजुर्गों से नित्य-नित्य रामायण, महाभारत की कथाएं सुनना महान व्यक्तियों की जीवनी सुनना जिससे उनके अंदर धार्मिक प्रवृत्ति तो पनपती हीं थी साथ-साथ आत्मविश्वास भी मजबूत हो जाता था। कहते हैं ना कि एक बगीचा को हरियाली मय बनाने के लिए माली को दिन रात मेहनत करके पौधों को कटाई-छटाई करना, समय पर पानी डालना होता है, उसी तरह बच्चों को जीवन में अच्छा इंसान बनाने के लिए माता-पिता को बहुत मेहनत करना पड़ता है। केवल महंगे स्कूल में पढ़ने से और सभी सुख सुविधा दे देने से ही बच्चों का सही विकास नहीं होता है सही विकास उसको नैतिक मूल्य समझाने से होता है।
बच्चे मोबाइल में हिंसक गेम खेलते-खेलते हिंसक प्रवृत्ति के हो जाते हैं, लेकिन इसमें पूर्ण रूप से बच्चों का ही दोष नहीं है क्योंकि माता-पिता दोनों नौकरी करते हैं बच्चे अकेले घर में बैठकर क्या करेंगे? मोबाइल तो देखेंगे, टीवी तो देखेंगे हीं उन्हें न कोई रोकने वाला नहीं टोकने वाला। माता-पिता को पता हीं नहीं चलता है कि उनके बच्चे कौन सी मानसिक स्थिति से गुजर रहे है।
पारिवारिक हिंसा
पारिवारिक हिंसा के कई कारण होते है। जिसमें से मुख्य कारण है अविश्वास! पारिवारिक सदस्यों में विश्वास के कमी हो जाने के कारण पारिवारिक जीवन तहस नहस हो गया है। पहले परिवार का मुखिया- पाँच परमेश्वर होता था। जो वह निर्णय लेते थे वो सर्वमान्य होता था लेकिन अब कोई किसी को मानता ही नहीं। जिस कारण से पारिवारिक अनुशासन टूट गया है।
अनुशासन टूटते ही सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा सबकी खिचड़ी बन गई है। सभी अपनी जो पैसे अपनी सुविधा से अच्छे-बुरे की परिभाषा देने लगे हैं। जो पैसे से सम्पन्न है उसका दोष जो निर्धन है उसके गुण पर भारी पड़ जाता है इससे परिवार में असमानता उत्पन्न होती है और यहीं हिंसक प्रवृत्ति जन्म लेती है।
नैतिक संस्कार
नैतिक संस्कार हमारे पारिवारिक पाठशाला का वरदान है जो अब बहुत कम दिखाई देता है जिसके लिए हम किसी एक को दोष नहीं दे सकते। हम सभी जिम्मेदार हैं। क्योंकि सही आचरण से सही व्यवहार बनता है और सही व्यवहार से संस्कार उसके बाद हम में नैतिकता आती है। लेकिन आधुनिक समय में दिखावे के होड़ में बहुत कम परिवारों में हमें संस्कार देखने को मिलता है। संस्कार विहीन युवा पीढ़ी अपने लक्ष्य को समझ ही नहीं पाते और अपने पथ से भटक जाते हैं।
इसका परिणाम यह होता है कि वे मानसिक और शारीरिक दोनों रुप से कमजोर होते जा रहे हैं। मैराथन रूपी जिंदगी में जब दौड़ने की बारी आती है तब असफल होते ही हीन भावना से ग्रसित हो जाते हैं, तब अपने आप को ही खत्म कर देते हैं या हिंसक प्रवृत्ति का होके गलत राह चुन लेते हैं। कभी-कभी बड़े-बड़े पढ़ाई बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ पर ग्लानि होती है। क्योंकि हमारे दादा बाबा अनपढ़ होते हुए भी हर परिस्थिति से लड़ने को तैयार रहते थे। आत्मबल से परिपूर्ण होते थे। अपने आचरण और व्यवहार से पारिवारिक और सामाजिक मर्यादा बनाकर रखते थे। बाल विवाह के कारण बेटियां बहुत कम उम्र में हीं विधवा हो जाती थी। लेकिन पूरी जिंदगी मान सम्मान के साथ अपने परिवार में रहकर समाज में बिता लेती थी इसके कारण थे पारिवारिक और सामाजिक अनुशासन!
आधुनिक समय में हम अपने माँ-बाप को संभाल नहीं पाते हैं। कभी-कभी लगता है हम विकास की ओर जा रहे हैं या विनाश की ओर।
निवारण: सरलता और सच्चाई
जैसे हीं हमारे जीवन में सरलता और सच्चाई आ जाएगी जीवन की उलझनें स्वयं सुलझने लगेंगी। कबीर दास जी ने सही कहा है:
“कस्तूरी कुंडल बसे
मृग ढूंढे बन माहि
ऐसो घटि घटि राम है
दुनिया देखे नाहि।।”
सच को सच कहने की हिम्मत- हमें निर्भय होकर सच के लिए हमेशा खड़े होना चाहिए। डर सच्चाई के जड़ को खा जाता है। डर से कभी विश्वास नहीं पनपता है कहीं भी चाहे वह परिवार हो या गाँव शहर समाज हो यदि कुछ गलत हो रहा है तो उसका विरोध होना चाहिए तभी झूठ के धूंध हटेंगे और विश्वास का सूरज निकलेगा।
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