जून, 2025

वार्ड नंबर 1, मोहल्ला मोदीका
कनीना, जिला- महेंद्रगढ़, हरियाणा
गुरु और शिष्य की परंपरा सदियों पुरानी है। चाहे सतयुग, त्रेता या द्वापर युग हो, सभी युगों में शिक्षा पाने के लिए शिष्य, गुरु के पास जाता रहा है। चाहे श्रीराम वशिष्ठ मुनि के पास गया हो या फिर श्रीकृष्ण संदीपन गुरु के आश्रम में गया हो। उस वक्त हर प्रकार का ज्ञान शिष्य को दिया जाता था किंतु वर्तमान समय में किताबी ज्ञान ही हावी हो गया है। किताबी ज्ञान के आधार पर ही नौकरी आदि मिल पाती है। किंतु इस कलियुग में विज्ञान की प्रगति ने डिजिटल युग का कपाट खोज डाला है। इस डिजिटल युग में पढऩा अत्यंत उपयोगी हो गया है। सत्य है कि डिजिटल युग में किसी भी विषय का विस्तृत रूप, जानकारी चाहिए तो चंद क्लिक में प्राप्त की जा सकती है, परंतु आलोचनात्मक सोच प्राप्त करना हो या एकाग्रता प्राप्त करनी हो, शब्दावली एवं भाषा कौशल को मजबूत करना है या फिर रचनात्मक और कल्पना को बढ़ावा देना हो तो पढऩा, विशेषकर पुस्तकें पढऩा बहुत जरूरी हो जाता है।
कहा गया है किताबें पढऩे से अलग-अलग दृष्टिकोण और विचारों के बारे में सोच प्राप्त कर सकते हैं। यह सोच डिजिटल द्वारा संभव नहीं है। आलोचनात्मक सोच को विकसित करने में किताबों का पढऩा बहुत जरूरी है। जहां एकाग्रता की बात है, ध्यान केंद्रित करने की बात हो पढऩा बहुत जरूरी है।
जिस प्रकार अर्जुन को स्वयंवर में मछली की आंख के अतिरिक्त कुछ नजर नहीं आता था, इसलिए एकाग्रता पैदा एवं विकसित करनी हो या सुधार करना है या शब्दावली और भाषा कौशल को बढ़ावा देना है तो नई-नई किताबों का अध्ययन बहुत जरूरी हो जाता है और आज के दिन तो अध्ययन की आवश्यकता बढ़ती ही जा रही है।
यदि जटिल विचारों का ज्ञान लेना है या कहानियों को समझने और उनका विश्लेषण करने में मदद पानी है तो भी पुस्तकों का होना बहुत जरूरी है। पुस्तकों को पढ़कर यह संभव है। यदि रचनात्मक सोच को बढ़ावा देना है, नई दुनिया, पात्रों, विचारों आदि की जानकारी हासिल करनी है तो भी पुस्तकों का अध्ययन आज के दिन डिजिटल युग में बहुत जरूरी हो गया है। कल्पना शक्ति को विकसित करना, अलग-अलग दुनिया और सच में अपनी कल्पना को ले जाना हो या विभिन्न विषयों क्षेत्र के बारे में ज्ञान प्राप्त करना हो तो पुस्तक का ज्ञान ही जरूर है।
किताबों से जहां मनोरंजन भी प्राप्त होता है और तनाव भी दूर हो जाता है वहीं विभिन्न संस्कृतियों, दृष्टिकोण, मूल्य आदि की जानकारी का विस्तार से अध्ययन पुस्तकों द्वारा ही संभव है। डिजिटल युग में किताबें सामग्री को बेहतर ढंग से समझने और उसका प्रयोग करने में मदद करती हैं। ये किताबें ही है जो इंसान को पढऩे की आदत डालती हैं, ऐसे में जीवन भर के लिए पुस्तक की पढऩा बहुत जरूरी हो जाता है।
किताबें पढऩे से कल्पना शक्ति ऐसे तरीके से विकसित होती है जो अक्सर डिजिटल मीडिया से कभी संभव नहीं हो पाती है। डिजिटल युग में धीमी गति से पढऩे, पाठ को बेहतर समझने, धीमी गति से पढऩे के लिए भी किताबें जरूरी हैं। रचनात्मकता को बढ़ावा देने के लिए पुस्तकों का होना बहुत जरूरी है। ऐसे में आज के डिजिटल युग में पुस्तकों का पढऩा निहायत जरूरी बन गया है, अगर पुस्तकों का अध्ययन नहीं किया जाए तो इंसान केवल अज्ञानता के अंधकार में घूमता रहेगा। वैसे तो डिजिटल युग में जहां शरीर में हर प्रकार से समस्यात्मक संकेत उत्पन्न होते जा रहें हैं। जबकि पुस्तकों में ऐसा कुछ भी शारीरिक दोष उत्पन्न नहीं होता। युगों युगों से पुस्तक पढ़ी जा रही है, ऋषि मुनि, देवता सभी पुस्तकों का ही अध्ययन करते आए हैं और पुस्तकों का ज्ञान ही डिजिटल युग में बहुत जरूरी बन गया है।
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