तमसोमा ज्योतिर्गमय

सितंबर, 2025

कामेश्वर चौधरी
विकासपुरी, न्यू दिल्ली

ढूँढता आकाश जिसको बादलों ने घेर ली है,
दूर चारों ओर चादर, क्षितिज ने जो ओढ़ ली है;
इन सुरंगों का न कोई अंत दिखता
राह के पत्थर को मैंने तोड़ दी है

देश दुनिया को समझने जा रहा हूँ
ज्ञान के आँगन भटकने जा रहा हूँ
दृष्टि उस विज्ञान की लेकर बढ़ा
जिसे सदियों से ही गुनता जा रहा हूँ।

व्यक्ति और समाज बढ़ते जा रहे हैं
नित नए सिद्धांत गढ़ते जा रहे हैं
पर ना रुकता है कहीं अन्याय है
भय प्रताड़ित लोग सब असहाय हैं।

ढूंढता आनंद कैसा शोर में
पर रहा कोहरा घना इस भोर में
तमस है चारों तरफ़ दीवार बन
कौन लाएगा दिया उस छोर में।

अस्तोमा सद्गमय की सीख दे
तमसोमा ज्योतिर्गमय की भीख दे
सुप्तोमा जाग्रत करो की लिख दे
गुरु मिले ऐसे जो गाड़ी खींच दे।
****

यह भी पढ़ें  सीएलफ संग जुड़ जाएँ

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top