जून, 2026

गाजियाबाद(उत्तर प्रदेश)
(कवि परिचय: सेवानिवृत अभियंता, साहित्यकार। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में सतत लेखन कार्य।
पहले तो बस यही पढ़ा था, ‘म’ से होता ‘माँ’
धीरे धीरे अब समझा, जीवन का है मतलब माँ।
आँचल में ममता, कदमों में चारों धाम है माँ।
रोम रोम में है करुणा, दुख के पूर्ण विराम है माँ।
तेरे ऊ लू ला ला, कहने भर से मैं हँसता।
मेरे उर में भी तो, तेरी छवि का रूप है बसता।
मंद मंद मुस्काती तू, देख मेरी किलकारी माँ।
हर मन को खुशियाँ दे, वह अनुपम क्यारी माँ।
कभी न रुकती, न थकती, तू ऐसी जलधारा।
जीवन के हर कठिन मोड़ पर बनती सदा सहारा।
बच्चों पर विपदा आए, ये न कभी तू सहती माँ।
दुश्मन की ख़ातिर तो, विष बनकर रहती माँ।
तेरी हर बात का मतलब, मैं भी खूब समझता।
तुम आँखों से कह देतीं, मैं आँखों से सुन लेता।
पहले अर्थ बाद में शब्द, तुझसे ही तो सीखा माँ।
ऐसा अद्भुत गुरु जगत में, दूजा न कोई देखा माँ।
एक कवच सी बन, पल-पल रहती संग।
निज सपने भी तज देती, ऐसा उसका रंग।
घर सकुशल आ जाएँ, तकती राह हमारी माँ।
बच्चे जहाँ चैन से सोएँ, ऐसी है फुलवारी माँ।
माँ की गोद में सिर रख, देखे बहुत से सपने।
कैसे कह दूँ वह थे, सब की सब मेरे अपने।
तेरा कर्ज चुका पाऊँगा, है तुच्छता हमारी माँ।
आशीष मिले सदा, होना सुमार्ग की प्रहरी माँ।
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