जून, 2026

जयपुर, राजस्थान
बिहार के एक छोटे-से कस्बे माधोपुर की एक तंग गली में ‘शब्द सागर’ नाम की छोटी दुकान थी। दुकान के बाहर लकड़ी का फीका बोर्ड टंगा था, जिस पर धूल जमी रहती थी। उस दुकान के मालिक थे- सुरेन्द्र बाबू, उम्र लगभग साठ वर्ष, खादी का सफेद कुर्ता, मोटा चश्मा, माथे पर हल्का चंदन, अवाज़ में अपनापन और किताबों से तो उन्हें इस कदर प्रेम मानों वो उनके बच्चे हों।
वे किताब बेचते कम, पढ़कर सुनाते ज्यादा थे। कोई बच्चा आता तो उसे कहानी सुनाते, कोई किसान आता तो उसे लोकगीत की किताब पकड़ाते। कस्बे के सभी लोग कहते- ‘सुरेंन्द्र बाबू किताब नहीं, संस्कार बेचते हैं।’ लेकिन धीरे-धीरे कस्बा बदलने लगा। अब गली में एक नई दुकान खुली- ‘अर्वाचीन मीडिया सेंटर’। वहाँ रंगीन पोस्टर लगे थे:
¨ ‘रोमांचक किस्से केवल दस रुपये!’
¨ ‘दो मिनट में प्रेम कहानी!’
¨ ‘रोने वाली कहानी मुफ्त सुनिए!’
एक दिन उनका पोता बब्लू बोला- ‘दादाजी, आपकी किताबों में मजा़ नहीं है। पास वाली दुकान में डर, रोमांस और लड़ाई सब मिलता है।’ सुरेंद्र बाबू मुस्कुरा दिए- ‘बेटा जो चीज़ जल्दी मजा़ देती है, उसे लोग जल्दी भूल भी जाते है।’
लेकिन बबलू कुछ समझ नहीं पाया।
कुछ समय बाद कस्बें में साहित्य प्रतियोगिता हई। ‘अर्वाचीन मीडिया सेंटर’ वाले ने चमकीले कागज पर छपी कहानियाँ बांटी। उनमें बड़े-बड़े शीर्षक थे, मगर भीतर शब्द खोखले थे।
सुरेंद्र बाबू चुपचाप अपनी पुरानी डायरी लेकर प्रतियोगिता में पहुँचे। उस डायरी में कहानी थी- एक बूढ़ी माँ की कहानी, जो हर शाम अपने बेटे के लौटने की राह देखती थी, एक किसान का अकेलापन, एक बूढ़े पिता की प्रतीक्षा और एक लड़की के टूटते सपने। जब उन्होंने कहानी पढ़नी शुरू की, तो पूरे पंडाल में शांति छा गई। कहानी समाप्त हुई तो लोगों की आँखें नम हो गई। उसी समय पीछे से आवा़ज आई- ‘इस कहानी में ऐसा क्या है? इसमें तो कोई ट्रेंड नहीं … फिर भी यह दिल को क्यों काट रहा है?’
श्रोतागण में से ही एक ने कहा- ‘इसमें बाजार नहीं था…जीवन था।’ क्योंकि यह लिखा नहीं गया….. जिया गया है। भीड़ में खड़ा ‘अर्वाचीन मीड़िया’ सेंटर का मालिक भी चुप था। उसे पहली बार समझ आया कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, मनुष्य के भीतर की संवेदना है।
उस दिन के बाद कस्बे में अजीब बदलाव हुआ। लोग फिर ‘शब्द सागर’ दुकान पर आने लगे। कोई किताब खरीदने, कोई गीत सुनने, कोई कहानी सुनने और कोई सिर्फ दो पल बैठने। बब्लू ने एक दिन दादाजी से पूछा- ‘दादाजी, बाज़ारवाद क्या होता है?’ सुरेंद्र बाबू ने सामने देखते हुए कहा- ‘जब चीजों की कीमत बढ़ जाए और इंसान की संवेदना घट जाए, वही बाज़ारवाद है। और साहित्य… वही है जो इस संवेदना को बचाकर रखे।’ बाजार शरीर खरीद सकता है बेटा, आत्मा नहीं। साहित्य जब तक मनुष्य के भीतर की आग को जलाता रहेगा, वह कभी खत्म नही होगा। शब्द जब बिकने लगते हैं, तो अर्थ मर जाते हैं, लेकिन जब शब्द जीने लगते हैं, तब साहित्य जन्म लेता है।’
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