सितंबर 2026

शिवपुरी, मुरादाबाद, उत्तर प्रदेश
मनुष्य को ईश्वर ने चिंतनशील प्राणी बनाया है। प्रश्न यह है कि मनुष्य कैसे अपने चिंतन और व्यवहार में अहिंसा को अपनाए? अहिंसा या हिंसा के बीज बचपन से ही उगने शुरू हो जाते हैं। यदि मनुष्य का भोजन शाकाहारी होगा, वह वेद, गीता आदि ग्रंथों के अनुसार व महापुरुषों के विचारों को अपनी जीवनशैली में अपनाएगा, तभी वह ‘अहिंसा परमो धर्म:’ मानकर अपने कार्यों को अंजाम दे सकता है। यदि इसके विपरीत प्रभाव है, तब जीवनशैली बदल जाती है।
नई पीढ़ी को संदेश
प्रश्न यह है कि जब चारों ओर हिंसा फैली है, तो कैसे हमारी नयी पीढ़ी अहिंसा के संस्कारों को आत्मसात करे? यह आचरण वह तभी कर सकती है, जब वह भारतीय संस्कृति व संस्कारों को अपनाकर अपना जीवन बिताए, सत्साहित्य का स्वाध्याय करे, आधुनिकता की गुलाम न बने और अपनी संस्कृति का सदैव स्मरण रखे।

प्रत्येक नागरिक का उत्तरदायित्व
एक जवाबदेह नागरिक के नाते हमारी जिम्मेदारी है कि हम देश व समाज को उन्नतशील बनाने के लिए अच्छे कार्य करें, घृणित कार्यों से सदैव बचें। अपने बच्चों में अच्छे संस्कार के बीज बोएँ, क्योंकि बच्चे मिट्टी के घड़े होते हैं—उन्हें जैसा चाहें वैसा ढाला जा सकता है। इसके लिए माताएँ सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं, लेकिन यह तभी संभव है जब वे स्वयं संस्कारवान हों; क्योंकि जिस तरह आज पारिवारिक वातावरण बदल रहा है, वह अत्यंत चिंतनीय है।
शिक्षा व बुद्धिजीवी जगत का उत्तरदायित्व
वर्तमान में शिक्षा जगत और बुद्धिजीवी वर्ग अपनी भूमिका भली-भांति नहीं निभा पा रहा है; क्योंकि घोर स्वार्थ-सिद्धि के लिए वह अपने कर्तव्यों से विमुख हो गया है। स्वार्थ-सिद्धि व सुविधाभोगिता का मायाजाल उसे जकड़ रहा है। प्रत्येक शिक्षक व बुद्धिजीवी को अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाना होगा, तभी वे समाज को नई दिशा दे सकने में सक्षम होंगे। यह वे तभी कर सकते हैं, जब उनकी करनी और कथनी में एकरूपता हो।
सरकार से अपेक्षाएँ व उसका कर्तव्य
हमें सरकार से अपेक्षाएँ हैं कि वह घोर स्वार्थ को छोड़कर देश के हित में कार्य करे, विकास के नाम पर विनाश न करे। भ्रष्टाचार पर पूरी तरह अंकुश लगाए, जनहित के कार्य करे और अपराधियों को शीघ्रता से दंड दिलवाए। अपनी कथनी-करनी व चाल-चलन में एकरूपता लाए।
जनसंख्या वृद्धि पर अंकुश लगाए; क्योंकि बढ़ती बेहिसाब भीड़ से अहिंसा की आशा करना बेईमानी होगी, क्योंकि भीड़ का कोई दिमाग नहीं होता। शिक्षा व स्वास्थ्य जगत को पारदर्शिता प्रदान करे तथा उन्हें मानव-उपयोगी बनाए। साथ ही न्याय व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त करवाए; क्योंकि जिस तरह न्याय देने वाले अपने स्वयं के आदेशों को ही येन-केन-प्रकारेण उलट-पलट रहे हैं, इस कारण उन पर आम आदमी का विश्वास कम होता जा रहा है। जब व्यक्ति को तुरंत न्याय नहीं मिलता है, तब वह हिंसक होकर कानून का सम्मान नहीं करता।
अहिंसा के प्रचार-प्रसार में धर्म और धर्मगुरुओं की भूमिका
अहिंसा के प्रचार-प्रसार में धर्म और धर्मगुरुओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है; क्योंकि धर्म ही हमें अच्छे मार्ग की ओर ले जाने की प्रेरणा देता है, मनुष्य को मनुष्य बनाता है। धर्म वही श्रेष्ठ है जो मानवता का पाठ पढ़ाए, श्रेष्ठ गुणों को धारण करवाकर इंसानियत सिखाए तथा देश व समाज के प्रति प्रत्येक मनुष्य को जागरूक बनाए।
इसके लिए हमारे धर्मगुरु महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, परंतु उसके लिए उन्हें निजी स्वार्थ छोड़ना होगा तथा त्याग व सत्य को स्वयं जीवन में धारण करना होगा। आज जिस तरह अज्ञान व पाखंड में धर्मगुरुओं की बाढ़ आ गई है और अनेक हादसों व दुर्घटनाओं के मंजर सामने आ रहे हैं, वे इस बात के साक्षी हैं कि कैसे कुछ लोगों ने धर्मगुरु का नकली चोला पहनकर धर्म का ह्रास किया है।
अहिंसा की सीमा और सुरक्षा का अधिकार
हम चाहते हैं कि मनुष्य अहिंसक बने, लेकिन हम यह भी नहीं चाहते कि कोई हम पर हमला करे और हम कहें कि ‘तुम और मारो’; क्योंकि अन्याय सहना भी एक प्रकार की हिंसा ही है। जिस तरह अतीत में हमारे देश को विदेशी आक्रांताओं ने अहिंसा का अनुचित लाभ उठाकर लूटा और नरसंहार किए, ऐसी कायरतापूर्ण अहिंसा हमें मान्य नहीं है। अहिंसा अपनाना तभी तक धर्म है जब तक वह सहनीय हो।
भगवान श्रीकृष्ण श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि अधर्म के विरुद्ध युद्ध करो, जबकि सामने उनके बंधु-बांधव ही थे। पूरा महाभारत युद्ध अन्याय के विरुद्ध हुआ था। इसलिए अन्याय के विरुद्ध हिंसा (प्रतिरोध) करना भी धर्म है। यदि कोई हम पर हिंसा कर रहा है, तब हमें आत्मरक्षा करने का पूरा अधिकार है, वह हिंसा नहीं है।
उपसंहार
सब सुखी हों, सभी को सद्बुद्धि आए। हम अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए कभी हिंसा न करें और हमेशा “अहिंसा परमो धर्म:” के सच्चे भाव का पालन करें।
