नानी का बरामदा और सावन के मेले

सितंबर 2026

रंजना झा
रंजना झा
साहित्यकार

बचपन के वे दिन भी कितने अजीब और खूबसूरत होते हैं, जब हमारी सादगी के पीछे एक नटखट शैतान छिपा होता था! मैं भी बचपन में बाहर से बिल्कुल सीधी-साधी और भोली-भाली दिखती थी, लेकिन मेरे इरादे बड़े पक्के और शरारती थे।
गर्मियों के दिन होते थे। दोपहर में जब सूरज बिल्कुल सिर पर आ जाता था, तो मम्मी थककर सुस्ताने के लिए लेट जातीं। जैसे ही मम्मी की आँख लगती और उनकी साँसों की धीमी रफ्तार से मुझे यकीन हो जाता कि वे सो चुकी हैं, मेरा असली खेल शुरू होता। मैं बिल्ली के पैरों से दबे पाँव उठती, लकड़ी के भारी दरवाज़े की सांकल को इस तरह धीरे से सरकाती कि उसकी ज़रा-सी भी आवाज़ न हो।
दरवाज़ा खुलते ही सामने कड़कड़ाती धूप मेरा स्वागत करती। दोपहर की उस तपती धूप में न जाने क्या जादू था, मैं बिना चप्पल पहने या बिना धूप की परवाह किए बाहर दोस्तों के साथ खेलने निकल जाती। धूल में दौड़ना, गिट्टियाँ खेलना और गलियों के चक्कर काटना—यही मेरी दुनिया थी। लेकिन इस खेल का अंत हमेशा एक जैसा ही होता था। जब मैं शाम को लाल चेहरा, पसीने से तरबतर और धूल से सने पैर लेकर घर लौटती, तो मम्मी दरवाज़ा खोलते ही सामने खड़ी मिलती थीं। फिर क्या! मम्मी का गुस्सा सातवें आसमान पर होता और मेरी अच्छी-ख़ासी पिटाई हो जाती। उस वक्त रोते हुए मैं सोचती कि कल से ऐसा नहीं करूंगी, पर अगली दोपहर मम्मी के सोते ही मेरा पैर फिर से दरवाज़े की तरफ बढ़ जाता था।
सर्दियों की छुट्टियाँ और नानी का गाँव
मम्मी की इस डांट-पिटाई से ब्रेक मिलता था सर्दियों की छुट्टियों में, जब हम सब भाई-बहन मिलकर नानी के घर जाते थे। नानी का गाँव, वे खुले खेत और सर्दियों की वह गुनगुनी धूप आज भी मेरे ज़ेहन में ताज़ा है। सुबह-सुबह कोहरे के बीच हम सब भाई-बहन खेतों की तरफ दौड़ लगा देते थे। ओस की बूँदों से भीगे खेतों में लगे लाल-लाल, रसीले टमाटर और हरी-भरी मटर देखकर हमारे मुँह में पानी आ जाता था। हम बिना धोए, वहीं बैठकर कड़त-कड़त करके मीठी मटर और खट्टे-मीठे टमाटरों का लुत्फ़ उठाते थे।
खेतों के बीचों-बीच फसलों की रखवाली के लिए एक ऊँचा मचान बना हुआ था। बाँस और बल्लियों से बने उस ऊँचे मचान को देखकर हम भाई-बहनों के अंदर का एडवेंचर जाग जाता। नानी ने सौ बार मना किया था— “वहाँ मत चढ़ना, गिर जाओगे!” पर हम कहाँ मानने वाले थे? एक-दूसरे को धक्का देते, हँसते-खिलखिलाते हम उस ऊँचे मचान पर चढ़ जाते और वहाँ से पूरे गाँव को देखते हुए खुद को आसमान का राजा समझते थे।
जब नानी को भनक लगती कि हम मचान पर चढ़े हुए हैं, तो वह हाथ में छड़ी लिए हाँफती हुई खेत पर आ जातीं। नानी हमें ऊपर देखकर नीचे से ही ज़ोर-ज़ोर से डांटना शुरू कर देती थीं— “नीचे उतरो तुम सब के सब! तुम्हारी मम्मी ने मुझे इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी देकर भेजा है। अगर किसी का हाथ-पैर टूट गया, तो तुम्हारी मम्मी मुझे ही आकर बोलेगी कि बच्चों को अकेला छोड़ दिया, कहाँ-कहाँ भेज दिया!”
नानी की डांट में एक अजीब-सी फ़िक्र और ममता होती थी। उनके ऊपर हम सब भाई-बहनों की ज़िम्मेदारी का भारी बोझ जो रहता था। वह हमेशा डरती थीं कि कहीं हम अपनी इन शरारतों में खुद को चोट न पहुँचा बैठें। पर हम भाई-बहनों की टोली तो जैसे आँधी थी। नानी की डांट सुनते ही हम मचान से सरपट नीचे उतरते और नानी के गले से लिपट जाते। नानी का गुस्सा पल भर में पिघल जाता और वह हमारे हाथों में गुड़ की डली थमा देती थीं।
सुल्तानगंज के आम और मामी का दुलार
सर्दियों के अलावा, सुल्तानगंज की इन गर्मियों की छुट्टियों का असली रोमांच तब दोगुना हो जाता था, जब हमारे साथ वहाँ के लोकल भाई-बहन (मौसी और मामा के बच्चे) भी मिल जाते थे। हम शहर से जाने वाले भाई-बहन और सुल्तानगंज के हमारे वे भाई-बहन मिलकर एक ऐसी फ़ौज बना लेते थे, जिससे पूरा मोहल्ला थर्राता था।
हमारे बीच ‘शहर और गाँव’ का कोई फ़र्क नहीं था; हमारी भाषा एक थी—अंगिका, और हमारा मक़सद एक था—सिर्फ़ और सिर्फ़ शरारत करना। वहाँ के भाई-बहनों को बग़ीचे के चप्पे-चप्पे की ख़बर होती थी। उन्हें पता होता था कि किस पेड़ का मालदा सबसे मीठा है और किस पेड़ पर चढ़ना सबसे आसान है। दोपहर में जब नानी और मम्मी सो जातीं, तो सुल्तानगंज के भाई-बहन ही हमें चुपके से घर से निकालने का रास्ता दिखाते थे। हम सब मिलकर आम के बग़ीचों में धावा बोलते। वे फुर्ती से पेड़ों पर चढ़ जाते और नीचे खड़ी हमारी टोली के लिए आम टपकाते।
दोपहर की उस तपती धूप में पेड़ों पर लटके ‘बिज्जू’ और रसीले ‘मालदा’ आम देखकर हमारा दिल बाग-बाग हो जाता था। पेड़ों पर पत्थर मारना, टपकते हुए आमों को झपट लेना और फिर वहीं बैठकर बिना काटे, चूस-चूस कर आम खाना… उन आमों का मीठा रस हमारी कोहनियों से बहता हुआ कपड़ों तक आ जाता था। उस स्वाद के आगे दुनिया की हर मिठाई फीकी थी।
सुल्तानगंज के इन प्यारे दिनों में हमारे बड़े मामा और बड़ी मामी का दुलार भी सोने पर सुहागा जैसा था। वे हम सभी बच्चों को बहुत मानते थे। बड़ी मामी तो हमें इतना प्यार देतीं और इतनी इज़्ज़त करती थीं कि उनका वह भोला चेहरा आज भी याद आता है। मामी का छोटा बेटा ‘छोटू’ और मैं बिल्कुल एक ही उम्र के थे। अब जहाँ हमउम्र बच्चे हों, वहाँ कॉम्पिटिशन तो होना ही था!

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नानी के यहाँ गाय हुआ करती थी। जब सुबह-शाम गाय का ताज़ा दूध उबाला जाता, तो पतीले पर मोटे-मोटे अक्षरों जैसी गाढ़ी मलाई जम जाती थी। वह मलाई हम दोनों को जान से भी ज़्यादा प्यारी थी। मलाई देखते ही मेरे और छोटू के बीच एक मूक युद्ध छिड़ जाता था। छोटू चाहता था कि सारी मलाई उसे मिल जाए और मेरी चाहत होती थी कि मलाई का बड़ा हिस्सा मेरी कटोरी में आए। हम दोनों आँखों-आँखों में ही एक-दूसरे को चुनौती दे डालते थे। लेकिन हमारी बड़ी मामी इतनी अच्छी और सुलझी हुई थीं कि वह हमारे इस द्वंद्व को पल भर में भांप जाती थीं। वह मुस्कुराते हुए चम्मच उठातीं और पतीले से खुरच-खुरच कर मलाई निकालती थीं। फिर बिना किसी भेदभाव के, हम दोनों की कटोरियों में बिल्कुल बराबर-बराबर हिस्सों में मलाई बाँट देती थीं। मामी की वह ममता और मलाई की वह बराबर मिठास आज भी मेरे दिल को सुकून से भर देती है।
सावन की शिवभक्ति और नानी का विशाल बरामदा
पर सुल्तानगंज का असली रंग तो सावन के महीने में निखरता था। यह वही पावन धरती है जहाँ मेरा जन्म हुआ था और जहाँ से लाखों शिवभक्त (कांवरिये) उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल लेकर बाबा धाम देवघर की कठिन यात्रा पर निकलते हैं। सावन आते ही पूरा सुल्तानगंज “बोल बम”, “हर हर महादेव” और “चल रे शिव कांवरिया शिव के धाम” के जयकारों से गूँज उठता था।
चारों तरफ केसरिया रंग का समंदर उमड़ पड़ता था। आम के बग़ीचे के आसपास और हमारे घर के इर्द-गिर्द कांवरियों की भारी भीड़ जुट जाती थी। दिनभर की लंबी पैदल यात्रा से थके-हारे कांवरिये पेड़ों की छाँव में विश्राम करते थे। शाम होते ही माहौल एकदम जादुई हो जाता। वे मिट्टी के चूल्हों पर मिलकर खाना बनाते, जिसकी खुशबू पूरे इलाके में फैल जाती थी। खाना तैयार होने के बाद, वे अपनी थकावट भूलकर झाल, मंजीरे और ढोलक निकाल लेते और बाबा भोलेनाथ के कीर्तन-भजन में लीन हो जाते। वह उमंग, वह उत्साह और श्रद्धा देखकर हमारे कदम खुद-ब-खुद उनकी तरफ खिंचे चले जाते थे। वे कांवरिये दिल के इतने अमीर और भोले होते थे कि प्यार से हम बच्चों को भी अपने पास बिठाते, अपने हाथों से बनाया हुआ सात्विक और स्वादिष्ट खाना प्रेम से खिलाते थे।
कभी-कभी तो भक्तों की भीड़ इतनी बढ़ जाती कि हमारी नानी के घर का बरामदा भी छोटा पड़ जाता था। पर नानी का दिल तो सुल्तानगंज की गंगा जैसा विशाल था। नानी हर अनजान राहगीर को अपने घर में शरण देती थीं। वह खुद सबको बड़े आदर से बरामदे पर बुलातीं, बिछावन देतीं और फिर सब मिलकर रात-रात भर कीर्तन करते थे। पूरा घर भक्ति के रस में सराबोर हो जाता था।
जब रात घनी होती और नानी के बरामदे पर कांवरियों की महफ़िल जमती, तब ढोलक की थाप और झाल की खनक के बीच हवा में हमारी अपनी अंगिका भाषा का वह सुरीला लोकगीत गूँजता—
“भई गेली भवानी जोगिया सं रिझी खेली भवानी जोगिया सं…”
—तो ऐसा लगता था मानो साक्षात् शिव और शक्ति उस आँगन में उतर आए हों। इस गीत का एक-एक शब्द सीधे दिल को छू जाता था। हम सब भाई-बहन एक-दूसरे का हाथ पकड़कर झूम उठते थे। बाबा भोलेनाथ की भक्ति का यह रंग सुल्तानगंज की मिट्टी में ऐसा रचा-बसा था कि वह सीधे मेरी आत्मा का हिस्सा बन गया।
स्मृतियों की खुशबू
आज जब मैं घर के एक कोने में शांत बैठी रहती हूँ, तो सुल्तानगंज के वे दिन, वह मौसम का आनंद, भाई-बहनों का हुड़दंग और सावन की वह चहल-पहल आँखों के सामने एक फिल्म की तरह तैर जाती है।
वक़्त का पहिया इतनी तेज़ी से घूमा कि वे दिन न जाने कहाँ पीछे छूट गए। अब न वह नानी का खुला बरामदा रहा, न वैसी सावन की रातें। आज हम सब अपनी-अपनी जिंदगियों में व्यस्त हो गए हैं, कई दूर चले गए हैं। पर जब भी मेरी जुबां पर वह अंगिका का गीत आता है— “भई गेली भवानी जोगिया सं…”—मैं इसे धीरे-धीरे गुनगुनाती हूँ, और बंद आँखों के पीछे यादों का एक झोंका आता है।
मुझे साफ़ दिखने लगता है सुल्तानगंज का वह आम का बग़ीचा, रसीले मालदा आमों की महक, नानी के घर का वह खुला बरामदा और सुल्तानगंज के अपने उन भाई-बहनों का मुस्कुराता हुआ चेहरा। दिन छूट गए, पर वह आपसी प्यार और सुल्तानगंज की खुशबू आज भी मेरे दिल में महकती है।

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