कहीं काव्य से वर्षा लुप्त न हो जाय

सितंबर 2026

 लता अग्रवाल
डॉ लता अग्रवाल ‘तुलजा’
A सेक्टर, इन्द्रपुरी,
भेल, भोपाल

बचपन में एक कहावत अक्सर सुनते थे— “वर्षा से जल, जल से वृक्ष, वृक्ष से बादल, बादल से वर्षा, वर्षा से जल। जल ही जीवन है।” जी हाँ! जल, जिसके बिना जीवन की कल्पना निराधार है; और इस जल का एकमात्र स्रोत है वर्षा। वर्षा से फसलों को पानी मिलता है तथा कुओं, तालाबों तथा नदियों के प्रयुक्त जल में हुई कमी को फिर से भरने का कार्य वर्षा के द्वारा ही होता है।
प्रकृति के चक्र में वर्षा का आगमन ग्रीष्म ऋतु के पश्चात् होता है। ग्रीष्म ऋतु में सूर्य देवता की प्रचंड किरणों का ताप सहने के उपरांत पृथ्वी कुम्हला जाती है, उसकी हरियाली पीत वर्ण में बदल जाती है। पृथ्वी के निवासी समस्त जीव-जंतु त्राहि-त्राहि करने लगते हैं। ऐसे में वर्षा की फुहारें पुनः पृथ्वीवासियों को जीवनदान देती हैं और पृथ्वी को उसका सौंदर्य पुनः लौटाती हैं। वर्षा के आगमन से जन-जीवन खुशहाल हो जाता है।
“लो पावस ऋतु आ गई / श्यामलता नभ पर छा गई /
वो कारी बदरी आ गई / पंख फैलाकर मयूर नाचे /
घन-घन-घन बादल नाचे / कोयल की मधुर आवाज़ आ गई /
लो पावस ऋतु आ गई।” — (हेमलता पालीवाल)
इस तरह की कविताओं के माध्यम से एक दृश्य बच्चों के सामने खींच दिया जाता था, जिससे वे न केवल पावस ऋतु, अपितु उसके आगमन पर प्रकृति के संकेतों को भी समझ सकते थे। बचपन के लिए कभी यह ऋतु बहुत ही सुखद होती थी। बचपन का बचपना खिल उठता था; बच्चे पानी से भरे किसी पोखर में छप-छप करते या घर की छत से पतनाले में बहते पानी में काग़ज़ की नाव चलाकर ऐसे खुश होते, मानो उन्होंने जीवन की नाव को साध लिया हो। उनके मन को कई कवियों ने शब्द दिए:
“वर्षा जल में चलो नहाएँ / काग़ज़ वाली नाव चलाएँ /
देखें जीत कौन है पाता / नाव बहा आगे ले जाता।” – —(रवि प्रकाश)
बचपन में हम अपने पिता या बड़े भाई के साथ बारिश होते ही छत पर जा पहुँचते और बारिश का आनंद लेते। उनके अनुसार पहली बारिश का पानी औषधि के रूप में होता है। हम आज भी याद करके मुस्कुरा देते हैं कि हमने कितनी काग़ज़ की नावें भी बनाईं और छत पर बहते पानी में बहाईं। जब बारिश का आनंद लेकर नीचे पहुँचते, तो माँ प्याज़ के पकौड़े तैयार रखतीं। बारिश को देखते ही स्वादिष्ट पकौड़ों का स्वाद याद आ जाता। मन गा उठता:
“बाहर रिमझिम बारिश हो / भीतर गर्म चाय की प्याली हो /
संग आलू-प्याज़ की पकौड़ी हो / बारिश का मज़ा दूना हो जाता है।”
आज के समय में न वह बचपन रहा, न वह बचपना। शिक्षा के बढ़ते बोझ ने बच्चे के मुख से मुस्कान तक छीन ली है।
कहा गया है:
“राजा वसंत / वर्षा ऋतुओं की रानी /
लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी /
राजा के मुख में हँसी, कंठ में माला /
रानी का अंतर द्रवित, दृगों में पानी” — (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)
जैसे एक माँ का अंतर्मन नमी से भरा होता है। तेज़ गर्मी के बाद बरसात के आते ही बच्चे गा उठते हैं:
“पानी आया… पानी आया… / गरज रहे बादल घनघोर /
ठमक-ठमक कर नाचे मोर / पी-पी रटने लगा पपीहा /
झन-झन-झन झींगुर का शोर / दूर कहीं मेंढक टर्राया /
पानी आया… पानी आया…” – —(डॉ. वीरेंद्र निर्झर)
वहीं वातावरण में सर्वत्र सकारात्मकता नज़र आती है, मन प्रफुल्लित रहता है; क्योंकि हरी-भरी प्रकृति आँखों के रास्ते दिल में उतर जाती है और दिल खुशहाल होकर कह उठता है:
“घन बरजत बरसत है मिहरा / बिजरी चमके डर मोहे लागे /
प्यारा लगेगा मिहरा। / दादुर मोर पपीहरा बोले /
आम की डाली कोयलिया बोले / पिहू-पिहू शब्द सुनो चैनन से / –
मानता ना सखी ये मिहरा।” – —(शिवदान राम जोशी)
जैसे नभ और धरा के एकाकार की ऋतु है वर्षा, वहीं प्रियतम और प्रिया के आत्मिक प्रेम की अभिव्यक्ति भी है यह ऋतु; जिसमें प्रियतम अपनी प्रेमिका को धरित्री के रूप में निहारता है:
“एक दिन मैं तुम्हें / भीगता हुआ देखना चाहता हूँ /
प्रिये! फूल की तरह / खिलते हुए तुम्हारे अंग-अंग को देखूँ /
और मुझे पृथ्वी की याद आए।” —(स्वप्निल श्रीवास्तव)
वर्षा हमारे लिए ढेर सारी खुशियों की बौछार लेकर आती है। प्रकृति का संगीत फ़िज़ाओं में लहरा जाता है:
“छम-छम दहलीज पे आई / मौसम की पहली बारिश /
गूँज उठी जैसे शहनाई / मौसम की पहली बारिश” — (देवमणि पांडेय)
बरसात की रिमझिम फुहारें प्रकृति को ही नहीं, जन-जीवन को भी उत्साह से भर देती हैं। हर दिल में प्यार के उन सोए पलों को जगा देती हैं, जिन्हें वक़्त की चादर ने अपने में समेट लिया है। हर दिल का यही हाल होता है:
“जब कभी प्यार की बरसात हुआ करती है /
दिन में सोती है, सारी रात जगा करती है /
वो जो आती है हवा चाँदनी फ़िज़ाओं से /
प्यार से फूल को, कलियों को छुआ करती है।”
वर्षा का कार्य ही है तप्त और मरु हुए दिलों को नमी देना, उनमें प्यार का अंकुर स्फुटित करना। आसमान में जब काले-काले मेघ वर्षा के आने की सूचना देते हैं, तो स्वयमेव दिल के बंधन खुल जाते हैं। पूरन मुद्गल जी लिखते हैं:
“मौसम की पहली बारिश पर / कुछ तुम लिखो /
इससे पहले बूंदें / कुछ-कुछ बेहतर लिख जातीं /
अक्षर-अक्षर जोड़कर / धरती की कोरी तख्ती पर।”
सभी पेड़ और पौधे नई हरी पत्तियों से भर जाते हैं तथा बगीचे और मैदानों में रंग-बिरंगे फूल अपना सौंदर्य बिखेरते हैं। कभी सूखा-मरु दिखने वाला ज़मीन का टुकड़ा भी मखमली घास से ढक जाता है। जल के सभी प्राकृतिक स्रोत जैसे नदियाँ, ताल-तलैया, तालाब और गड्ढे पानी से भर जाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो प्रकृति खिली-खिली दिखाई देने लगती है। लगता है धरती ने अपना मुरझाया यौवन पुनः प्राप्त कर लिया है। धरती के इस अलौकिक रूप को देखकर बादल भी उसके आकर्षण में एक प्रेमी नायक की भाँति खिंचा चला आता है और अपने प्रेम की रसमय फुहारों से उसे सरस बना देता है। जैसे ही धरती पर बूँदें पड़ने लगती हैं, वैसे ही मिलन की भीनी-भीनी सुगंध उठने लगती है। वृक्षों में नया जीवन आ जाता है, पक्षीगण कलरव करने लगते हैं। इस प्रकार वर्षा का आगमन संपूर्ण वातावरण को खुशनुमा बना देता है:
“ज़ोर से उमड़ा अंबर / ले घटाएँ घनघोर /
ज़ोर से बरसा / उँडेल दिया प्यार सारा धरती पर /
धरती ने भी प्रिय के इस प्रणय को / समेट लिया आगोश में अपने /
दोनों के इस प्रणय-मिलन से / नया संसार धरती पर अठखेलियाँ करने लगा।” —(डॉ. लता अग्रवाल)
किंतु यह एक पहलू है; दूसरा पहलू है समाज का वह वर्ग जो अभावों में जीता है। वर्षा का आगमन उसे भाता तो है, किंतु उसके प्रकोप से वह डरता भी है। बरसात से अपने परिवार को बचाने के लिए वह जतन करता है। भले ही अब कबेलू (खपरैल) की वह छत और कच्चे आँगन कम हो गए हों, मगर फिर भी वह वर्ग आज भी ज़िंदा है जो बरसात की पूर्व सूचना पाते ही पन्नी से अपनी झोपड़ी की हर एक दरार को सुरक्षित कर लेता है। गुलज़ार जी की ये पंक्तियाँ उन पर सटीक बैठती हैं:
“बारिश आने से पहले / बारिश से बचने की तैयारी जारी है /
सारी दरारें बंद कर ली हैं और लीप के छत /
अब छतरी भी मढ़वा ली है।”
भारत, जो कि प्राचीन काल से ही कृषि प्रधान देश रहा है, वहाँ ग्रीष्म के ताप से पपड़ाई धरती है, पत्ता-पत्ता झरते वृक्ष हैं, ठौर को बिलखते पक्षी हैं—इन सभी को बरसात का बेसब्री से इंतज़ार होता है। इन सबसे अधिक काली घटाओं का इंतज़ार अगर किसी को होता है, तो वह है भारत का किसान। हमारे किसान भाई इस मौसम में फसलों की तंदुरुस्ती के लिए भगवान इंद्रदेव से प्रार्थना करते हैं कि:
“ज़मीन जल चुकी, आसमान बाक़ी है /
सूखे कुएँ! तुम्हारा इम्तिहान बाक़ी है /
बादलों! बरस जाना इस बार समय पर /
किसी का मकान गिरवी है, तो किसी का लगान बाक़ी है।”
एक तरफ बरसात जहाँ लोगों को गर्मी से राहत देती है, वहीं दूसरी तरफ इससे कई सारी संक्रामक बीमारियों के फैलने का डर भी बना रहता है। फसलों के लिहाज़ से अत्यंत लाभदायक वर्षा थोड़ी-सी असावधानी रखने पर अपने साथ कई संक्रामक बीमारियों को भी लेकर आती है। इसके कारण डायरिया, पेचिश, टाइफाइड और पाचन से संबंधित परेशानियाँ सामने आती हैं। अतः सेहत के प्रति जागरूकता बहुत आवश्यक है। किसी ने ठीक कहा है:
“वर्षा ऋतु हज़ार नेमतें लेकर आती है /
मुश्किलें भी मगर कम नहीं /
पाचन क्षमता को प्रभावित करती /
गंदे पानी से बीमारियाँ जन्मतीं /
मच्छरों और कीटों का प्रकोप बढ़ाती।”
सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कवियों की ये तमाम कल्पनाएँ निराधार हैं यदि वर्षा ही न हो। जी हाँ! आज धरती तप रही है, सूर्य आग उगल रहा है, पेड़-पौधे सूख रहे हैं, पशु-पक्षी जल बिना बेहाल हैं, हर व्यक्ति बेसब्री से मानसून की प्रतीक्षा कर रहा है। किंतु कहीं भी वर्षा की आहट सुनाई नहीं दे रही:
“जुलाई हो गई / पानी अभी तक नहीं गिरा /
पिछली जुलाई में / जंगल जितने बचे /
अब उतने नहीं बचे / यही कारण तो नहीं…?” —(विनोद कुमार शुक्ल)
हमें इन कारणों पर चिंतन करना होगा। सच तो यह है कि ये ऋतुएँ महज़ ऋतुएँ नहीं, प्रकृति का वह संकेत हैं जिनका हमारे शरीर और जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
हवाओं का यह मौसमी बदलाव हिंद महासागर से नमीयुक्त हवा लाता है, जो बारिश के आगमन का सूचक होता है। बरसात ग्रीष्म से तप्त धरती को शीतलता तो देती ही है, हमारी नदियों, झीलों और जलाशयों को भी जल से लबालब कर देती है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक सभी पर मानो वर्षा ऋतु का जादू छाने लगता है। आज की व्यस्तता में हम इस जादू को अनुभव तो करते हैं, मगर इसका आनंद नहीं ले पा रहे। प्राचीन समय का कृतज्ञ समाज इस ऋतु में भगवान इंद्र की पूजा करता था, ताकि पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों और वनस्पतियों का जीवन खुशहाल रहे। कृषि प्रधान देश में किसानों के लिए तो वर्षा का पानी अमृत की तरह होता है, इसलिए वे आह्वान करते हैं:
“बरसो रे मेघा-मेघा, बरसो रे मेघा बरसो /
मीठा है, कोसा है, बारिश का बोसा है… /
गीली-गीली माटी पे चल घरोंदा बनाएँगे /
हरी-भरी उंबी, उंबी की डाली मिल के झुलाएँगे।”

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