
“अक्षत बीच मत्थे पर लगाइव ” ठकुराइन चिल्लाईं। छोटी बहू काँप उठी। उसने सिन्दूर, तेल, हल्दी, कुँए की दूब आदि को थाली में सजाया तथा भोलेनाथ का सुमिरन किया और आँगन में जाकर कलुआ को पतला सा मगर लम्बा टीका लगाया। तब तक दनदनाती हुई ठकुराइन पहुँची और घुड़कते हुये छोटी बहू के हाथ से थाली छीन ली। ठकुराइन ने एक लम्बा और चटख टीका कलुआ के माथे पर लगाया और ‘‘हर-हर महादेव” का उदघोष किया। हर्ष से पुलकते हुये ठकुराइन ने कहा ‘‘जा बेटवा ”।
उनका रोम-रोम अपने बेटे को ‘‘विजयी भव ” का आशीर्वाद दे रहा था। उनका ये बेटा मुल्क की सरहद पर लड़ने नही जा रहा था और न ही किसी नौकरी के साक्षात्कार पर जा रहा था। उनका ये बेटा आज गाँव की सबसे प्रतिष्ठित जंग लड़ने जा रहा था। शाम को शंकरजी के थान पर उनके बेटे की किस्मत का फैसला जो होना था। दरअसल उनका ये बेटा ‘कलुआ’ उनका कुत्ता था। जो आज पूरब – पट्टी के साथ लड़ाया जाने वाला था।
पूरब पट्टी के प्रधान इस बार ‘चुनिया’ को लाये थे। जो उनके एक खास रिश्तेदार द्वारा खास प्रयोजन हेतु चुनी गई थी। छोटी देह वाली, ठिगनी सी ‘चुनिया’। वह भूसे की रंगत की थी तथा उसकी पूँछ भी काफी छोटी थी। पिछले पांच वर्षों से ये लड़ाई बसन्त पंचमी को होती रही थी। करीब पांच वर्षों पूर्व, पूरब पट्टी और दक्खिन टोला के लड़कों के मामूली विवाद से उपजी वर्चस्व की ये लड़ाई अब गाँव की परम्परा का हिस्सा बन चुकी थी। दोनों पक्षों के औरतों की मनुहार और बड़े-बूढ़ों के समझाने के बावजूद दोनों पक्ष कई बार मारने-मरने पर उतारू हो जाते थे। बस तभी से गांव के ये दोनों दल एक दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिशों में लगे रहते थे। कभी बैलों की ऊँचाई, तो कभी बकरियों के बच्चों की संख्या तक इस वर्चस्व की लड़ाई का पैमाना बनते थे। एक इत्तेफाक के जरिये ही वर्चस्व की इस लड़ाई का समाधान कुत्तों की जंग के रूप में सामने आया था।
इस साल के मजमे में तो आस-पास के दो-चार गांवों के लोग भी इकट्ठा हो गये थे। मुनादी हुयी तो दो-चार ठेले भी आ गये। पान और शरबत की दुकानें भी सज गयीं। पंडित ने ‘‘जय बम भोले” की हुँकार भरी और नारियल फोड़ा, तो गांव वालों की निगाह में कई साल पहले की घटना नाच गयी।
तब किस प्रकार कलुआ और मोती लड़े थे ? तब भी गाँववाले इतने ही उत्साहित थे। तब तो दो पुरवों को जोड़ने वाले शंकरजी के थान पर बेजुबान लड़ाके एक दूसरे को मार डालना चाह रहे थे। कुत्ते, यूँ एक दूसरे को नोच रहे थे, मानो वे अपने-अपने मालिकों के नमक का फर्ज़ अदा कर रहे हों। और उनके मालिक, जो अपने बेटों से संतुष्ट नही थे। वे, कुत्तों के जरिये अपने अहं की तुष्टि का जरिया ढ़ूंढ रहे थे। तब ‘कलुआ जीत गया था और मोती हार गया था। दक्खिन टोला के लोग हुँकारते रहे थे और पूरब पट्टी के प्रधान पैर पटकते हुये चले गये थे। तब दक्खिन टोला के ठाकुर मूँछों पर ताव देते हुये पूरे गाँव को उपहास की दृष्टि से बड़ी देर तक देखते रहे थे। उनकी आंखें ही बयां कर रही थी उनके उद्गार कि ‘‘देखव, हम जग जीत लिहेन ”।
फिर गाँव के लोग खेती-पाती और नमक, तेल, लकड़ी के जुगाड़ में व्यस्त हो गये थे। मगर पूरब-पट्टी के प्रधान व्यथित ही रहे और वे पूरे बरस भ्रमण ही करते रहे थे। वे इधर-उधर से किसी भी तरह से जुगाड़ बनाने में लगे रहे, कि किस तरह से ‘कलुआ’ को परास्त करने के लिये कोई कुत्ता लायें।
तब हारने के बाद ‘‘मोती” को जहर दे दिया गया था। और वो बेजुबान लड़ाका तड़प-तड़प कर इस तरह मरा था कि मानो किसी बिन ब्याही बेटी ने अवैध सन्तान को जन्म दिया हो और इज्जत की बलि वेदी पर नीम – अँधेरे में ही उसे मार दिया गया हो। खैर, काफी जतन के बाद प्रधान की खोज पूरी हुई थी और ‘‘मस्तराम ” नामक कुत्ता प्रधान के साढ़ू के यहाँ से लाया गया था। पूरी पूरब-पट्टी ने मस्तराम की अगवानी की थी।
भगवान की आरती करने के बाद प्रधानिन ने इस तरह मस्तराम की बलैंयाँ ली थी, मानो प्रधान बहू घर लाये हों। मस्तराम की खूब आव-भगत हुई थी। कुछ गीत-गान भी हुआ था। इस आगमन के उपलक्ष्य में आयोजित भोज में पूरी पूरब-पट्टी सम्मिलित हुई थी। नाइन और धोबिन को खाना भी दिया गया था।
ये खबर दक्खिन टोला तक भी पहुँची मगर उस टोले के लोग निश्चिन्त थे। वे सब एकमत थे कि ‘कलुआ’ पर हनुमानजी की कृपा है ।क्योंकि वह दिन – रात हनुमान जी के मन्दिर पर ही पड़ा रहता है।उस पर जरूर देव कृपा है। उसे कौन हरायेगा?
मस्तराम को खूब गुड़ खिलाया जाता ताकि वो विपक्षी पर तेज आक्रमण करे और खूब नोचे। पूरब-पट्टी वालों ने एक नौकर का भी बन्दोबस्त कर दिया था, मस्तराम की देखभाल के वास्ते। मस्तराम के कान कटवाये गये, उसको पट्टा पहनवाया गया। पूरब पट्टी भर की औरतें घर का सबसे अच्छा खाद्य पदार्थ ‘मस्तराम को खिलातीं। अब तो बलेसर पंडित भी अपनी जजमानी में आते तो मस्तराम से चिढ़ने लगे थे, उसकी आवभगत एवं ठाठ देखकर बड़बड़ाते –
‘‘घोर कलजुग हय भाई, कुकुर का यतना सम्मान”।
पूरब पट्टी में जो भी आगंतुक आता उसे एक न एक बार ‘मस्तराम’के दर्शनार्थ अवश्य उपस्थित होना पड़ता।
अभ्यास के लिये मस्तराम को देसी कुत्तों से लड़वाया जाता। देसी कुत्ते मस्तराम से लड़ते क्या? वे उसकी आव-भगत से ही सहमे रहते थे। देसी कुत्ते खूब समझते थे कि वे मस्तराम की बराबरी के नही हैं। शायद इसीलिये वे ‘‘मस्तराम ” पर वार ही नहीं करते थे। वे डरकर, सहमकर, बिदककर भाग जाया करते थे। देसी कुत्ते कदाचित जान गए थे कि अगर मस्तराम पर वार किया तो जो रूखी-सूखी मिलती है, वो भी हाथ से जाती रहेगी। जानवर शायद रोटी का गणित इंसान से बेहतर समझते हैं इसीलिए ताल -मेल बनाकर रहते हैं।
दिन गुजरते गये। बसंत-पंचमी नजदीक आ गई। जोर-शोर से सारी तैयारियां की गईं। दिन ढ़लने से पूर्व ही लोग बसंत पंचमी के मेले से लौट आये थे।
लोगों में उत्साह इतना ज्यादा था कि देखते ही बनता था।गाँव में मानों कुत्तों की लड़ाई नही, अपितु स्वंयवर हो रहा हो। सो तय समय से पहले ही थान पर श्वानों का युद्द शुरू हो गया।लोगों का हुजूम लगा हुआ था। दोनों तरफ से चीख-पुकार, हुँकार, गालियों और तालियों की बौछारें होती रही थी। बेजुबान लड़ाके किस्म-किस्म की आवाजें निकालते हुये एक दूसरे को नोचते रहे थे और लोग इस श्वान युद्द का मजा लेते रहे।
पर अंततः कलुआ जीत गया था। दक्खिन टोला फिर जीत के जश्न में डूब गया और पूरब पट्टी में मरघट सा सन्नाटा छा गया था। दक्खिन टोला में ढोल बजी थी। मंगल गीत गाये गये थे। फिर गुलगुले बंटे और देर रात तक ठाकुर की चौपाल में गप्पों और कहकहों के दौर चलते रहे थे। टोले भर के बच्चे खाना खाये बिना ही सो गये थे। क्योंकि टोले भर का भोजन इकट्ठे जो बन रहा था। खाना बहुत ज्यादा बन रहा था और उसे बनने में काफी वक्त भी लग रहा था। दूसरी तरफ पूरब-पट्टी के बच्चे भी बिना खाना खाये ही सो गये थे। चूँकि घर के पुरूष इतने गमजदा थे कि महिलाओं ने बच्चों को डपटकर सो जाने पर बाध्य कर दिया था।
अगली सुबह गाँव के बाहर मस्तराम की लाश पायी गयी थी। उस बेजुबान लड़ाके को ताकतवर न होने की सजा दे दी गयी थी। पूरब-पट्टी वालों ने ऐसा करके ही अपनी तसल्ली की थी। उस पट्टी के कम ताकतवर कुत्तों ने स्वंय पर गर्व किया कि अपने कमजोर होने की इकलौती वजह से कम -से – कम वे आज जीवित तो हैं।
समय पंख लगाकर उड़ता गया। गाँव के लोग खेती, किसानी, ब्याह-मुण्डन में व्यस्त रहे थे औा बसंत-पंचमी का त्योहार फिर निकट आ रहा था। प्रधान की आंखों में नींद न थी। वे संभावित हार के डर से दुखी रहते थे। पूरब-पट्टी वालों की कई मीटिंग हुई मगर कोई बात तय न हो सकी थी। होते -करते अंततः प्रधान को ही सर्वसम्मति से उचित निर्णय लेने के अधिकार दे दिये गये थे।
प्रधान ने इस बार ज्यादा दिखावा नही किया और दो चार गाँव देखने के बाद ही तीसरे दिन एक कुतिया ले आये थे। उसका नामकरण पहले ही हो चुका था ‘‘चुनिया ”। सीधी सादी ठिगनी सी कुतिया। खाती भी कम, भौंकती भी कम और काटती तो बिल्कुल नहीं थी।
पूरब पट्टी के लोग इस बात पर एकमत थे कि ‘‘परधान सिरियाय गये हैं। जौन कलुआ के मुकाबिला मोतिया और मस्तराम जेस हट्ठा-कट्टा कुकर न कै सकै, उयकै मुकाबला ई ठिगनी सी कुकरिन का करी”। दक्खिन टोला के ठाकुर ने ये खबर सुनी तो उन्होने हुँकार भरी कि ‘‘परधान कलुआ कै खातिर लड़ाका नाही, दुल्हिन लावा है” ।
इसी लुत्फ़, कयास और तफरीह में गाँव वालों के दिन गुजरते गए।बसंत पंचमी के दिन फिर महफिल सजी। मुकाबले को इस बार इकतरफा माना जा रहा था। युद्ध स्थल पर ही ठाकुर ने हुँकार भरी और कथा-वाचन करने लगे –
‘‘हमरे बड़वार लड़का कै तबीयत खराब रही। डल्लफ पर लै के एक नौकर के साथे तुलसीपुर गयेन रहा। इहाँ से चार कोस कै रस्ता है। डाग्डर साहेब कोठी के अन्दर जब इलाज करत रहै। तब्बै उहैं डाबरमैन कुकर बांधा रहा। डाबरमैन कलुआ का देखकै भूँकै लाग। उ डाबरमैन कौनों तरह से छूटि गवा औ कलुआ पै हमला कै दिहिस। डाबरमैन पर चढ़ि बइठा कलुआ, औ उकै दुरगति करि डालिस। मौका के जगहा छोड़िकै भाग गवा डाबरमैन। हम डाग्डर साहब से कहेन कि हम शरमिन्दा हन, ई बात के खातिर। तब डाग्डर साहब कहिन के ठाकुर यहमा शरमिन्दा होय कय-कौनौ बात नाही है। तोहार कुकर, कुकर नाही समुच्चै बाघ है। कलुआ ने दुनिया कै सबसे ताकती नस्ल कै कुकर डाबरमैन को हरा दिया। डाग्डर साहब कलुआ के खातिर हमैं पांच हजार रूपिया तक देत रहै। मगर हम मना कर दिहेन, के कलुआ हमार कुकर नाही, बल्कि हमार बेटवा है। औ अपने बेटवा का कोई बेचत थोड़ौ है”।
ठाकुर का प्रवचन समाप्त हुआ तो दक्खिन टोला वालों ने कृतज्ञ भाव से ठाकुर को देखा। वे गर्वित थे कि वे भाग्यशाली है, क्योंकि कलुआ उनकी तरफ का है। कंधे को चौड़ा करके गर्दन में अंह की अकड़ लाते हुये ठाकुर ने चंहु ओर दृष्टिपात किया और अपनी निश्चित विजय के इन्तजार में निर्धारित स्थान पर बैठ गये।
जंग शुरू करने का ऐलान हो चुका था। भीड़ ने शंकरजी के थान को चारों तरफ से घेर रखा था। लोगों की बेचैनी और कोलाहल बढ़ता ही जा रहा था। दोनों तरफ के लड़ाकों को मैदान के बीचो-बीच कर दिया गया था। लोग बाग स्वंय ताल ठोंकने लगे, जानवरों को ललकारने लगे। गालियां मिश्रित प्रोत्साहन पा रहे थे, वे बेजुबान लड़ाके। शोर एवं उत्तेजना इतनी बढ़ चुकी थी कि लोग एक दूसरे पर टूट पड़ने पर आमादा थे काफी देर तक जंग की हुँकारें भरी जाती रहीं, मगर लड़ाई शुरू न हो सकी। कुत्ते आपस में तैयार ही नही थे। वे गुर्राते रहे। एक दूसरे के आगे-पीछे घूमते और सूँघते रहे मगर लड़ न सके।
थोड़ी देर तक गुर्राने के बाद कलुआ, चुनिया को चाटने लगा। चुनिया वहीं लेट गई, मानो उसने कलुआ का प्रणय-निवेदन स्वीकार कर लिया हो। ठाकुर और प्रधान तथा दोनों पक्षों के समर्थकों ने अथक प्रयास किये, मगर वे लड़ाके लड़े नही। आखिर प्रकृति के नियमों का उंल्लघन सिर्फ मनुष्य ही किया करते हैं, जानवर नहीं।वैसे भी लड़ाइयां सिर्फ समान लिंग में होती है, विपरीत लिंग में नही। विपरीत लिंगों के दरम्यान सिर्फ प्यार ही पनप सकता है। कलुआ लड़-लड़ कर थक चुका था, और लड़कर थका हुआ योद्धा सिर्फ प्रेम का भूखा होता है। जब कलुआ और चुनिया आपस में लड़े ही नही, तो मुकाबला बराबरी पर छूटा।
ठाकुर झल्लाकर पैर पटकते हुये चले गये तो प्रधान मुस्कराते हुये उठे। भीड़ भी अंततः छँट गयी अगर कुछ रह गया तो सिर्फ तरह-तरह की बातें।
एक महीना गुजर गया। दोनों पक्ष के लोगों को चैन न था। जहाँ दक्खिन टोला खुद को जीता हुआ माने बैठा था मगर जीत नही पाया था। वहीं पूरब पट्टी वालों को थोड़ी सी तसल्ली इस बात की थी कि ‘‘चलौ हार से तो बराबरी ही नीक”। उन लड़ाकों के प्रेम के चर्चे भी आस-पास के गांवों तक उड़ रहे थे। युद्ध स्थल के आस-पास ही वे दोनों अक्सर प्रेम-क्रीड़ायें करते नजर आ जाते। प्रधान इस घटना पर मुस्कराते तो ठाकुर की भवें चढ़ जातीं। ठाकुर इस तरह से परेशान होते, कि मानों उनका बेटा किसी गलत लड़की की संगति में पड़ गया हो।
अर्सा भी न गुजरा था कि इलाके की एक मशहूर और प्रतिष्ठित शादी में प्रधान और ठाकुर दोनों ही मौजूद थे। जिसका अंदेशा था वही हुआ। सँभालते-सँभालते बात आखिर बढ़ ही गई और बहस का मुद्दा बना ‘कलुआ और चुनिया’ का प्रेम। अचानक प्रधान दहाड़ उठे –
“ हम ठाकुर का उकै औकात बताय दिहेन। हारे हुये मानुस का मूँछ राखै का कौनौ हक नाही। चुनिया तौ तैयारय रही, मगर कलुआ ही हार कै डर से नायी लड़ा। कमजोर मनई कै कूकूर भी कमजोरय होत है ”।
ठाकुर भी तड़कते हुये बोले-
‘‘चलौ मानेन हमार लड़िका खराब निकल गवा। लकिन हम तौ तुम्हार मादा का निकलवाय दिया। उका आपन लड़िका कै रखैल बनाय दिया। इज्जत तौ तुम्हरै ही गय परधान। जस हमरे बेटवा और हमरे कुकूर मा कौनो फरक नाही है। वहि हिसाब से तौ तुम्हरी बिटिया औ कुकुरिन मा कौनो फरक नाही है। कुकुरिन है तो का, मादा तो है। जौन तरफ कै मादा होत है, इज्जत भी उधरै कै जात है। नर कै का है, चाहै पुरूष होय या कुकुर, उकै कुछू नाही बिगड़य वाला है”।
बात विवाद में बदल गयी। लाठिंया और भाले निकाल लिये गये। बमुश्किल बीच-बराव कराया गया। दोनों पक्षों को बात लग गयी थी। एक को अगर बेटे जैसे कुत्ते का अफसोस था, तो दूसरे को इज्जत कम हो जाने की चिन्ता खाये जा रही थी। प्रधान काफी परेशान थे, कुतिया हुई तो क्या, मादा तो उन्ही के तरफ की थी।
उसी रात को ही ठाकुर ने अपने बेटे सदृश कुत्ते को जहर दे दिया, जो कभी उनकी शान हुआ करता था। दूसरी तरफ पूरब पट्टी में जिस चुनिया के दम पर प्रधान ठाकुर को हराने का दम भरा करते थे, उसी को जहर दे दिया।
दोनों बेजुबान लड़ाके अपने पालने वालों के हाथों जहर मिश्रित भोजन करके, निश्चिन्त होकर शंकरजी के थान के पास फिर मिले। थोड़ी देर बाद तड़प-तड़प कर मर गये वे दोनों । सुबह गांव वालों ने उन लड़ाकों की लाशें देखीं। इस लड़ाई में न तो पूरब-पट्टी हारी थी और न ही दक्खिन टोला हारा था। अगर कोई हारा था वो थी शंकरजी की बेजुबान मूर्ति। जो उन दो लड़ाकों की मृत्यु की साक्षी बनी थी।
शंकरजी का थान ही तो उन लड़कों के युद्ध-प्रेम और मृत्यु का मूक साक्षी था।
समाप्त
