
कब्रिस्तान पूरी तरह खाली था । बहुत सालों बाद वह इस कब्रिस्तान को इतनी पास से देख रहा था । बचपन में वह जहां रहता था ।उस जगह पर मस्जिद औऱ ईदगाह दोनों ही थी । वहां तब मुसलमानों की खासी आबादी हुआ करती थी।
हफ्ते में एक-आध बार मस्जिद से किसी न किसी के इंतकाल फरमाने की मुनादी हुआ करती थी और ये भी इत्तला दी जाती थी कि नमाजे जनाजा किस वक्त होगी । उसके साथ ये भी बताया जाता था कि कब सुपुर्द -ए -खाक किया जाएगा। उसके साथ खेलने वाले ज़्यादातर बच्चे मैयत में चले जाया करते थे । वह भी अक्सर उन बच्चों के साथ कब्रिस्तान चला जाता था क्योंकि जब चले ही गए तो खेलेंगे किसके साथ ?
आज दो दशक बाद वह इस कब्रिस्तान में आया । ऐसा नहीं था कि पिछले दो दशक में वह किसी को मिट्टी देने नहीं गया पर दो दशक में बहुत कुछ बदल गया । उसका घर,उसका रोजगार,उसका सामाजिक स्टेटस । पुराना कब्रिस्तान अब गरीबों के मोहल्ले के मुर्दों का पनाहगाह था । अब वह गरीबों के मोहल्ले में नहीं रहता था और न ही किसी गरीब से उसका जाती राब्ता रहा था। जब गरीबों से राब्ता नहीं तो गरीबों के कब्रिस्तान में जाने का सवाल ही नहीं पैदा होता था । वैसे भी कब्रिस्तान कोई तफरीह की जगह तो थी नहीं ,जहाँ कोई अपनी मर्जी से जाता हो।
पर आज उसे जरूरत खींच लाई थी। उसने वक्त का अंदाजा लगाया कि अंधेरा हो चुका है ,अब सब जा चुके होंगे। ये सोचकर वह कब्रिस्तान के पास पहुँचा। गेट बंद था उसके मन में असमंजस था कि गेट खोल कर वह अंदर जाए या नहीं ,पता नहीं हिंदुओं को ऐसे कब्रिस्तान में जाने में मनाही हो । उसने एक लड़के से पूछा –
“ मुझे अंदर जाना हो तो , मैं हिन्दू हूँ अंदर जा सकता हूँ क्या ”।
“कब्रिस्तान में तो कोई भी जा सकता है । क्या हिन्दू क्या मुसलमान ” वह लड़का हिकारत से बोला।
गेट से अंदर घुसा तो एक गेट से लगा एक छोटा सा कमरा और बरामदा था। लाइट न होने की वजह से बरामदे में नीम अंधेरा था । वह अंदर तो आ गया था मगर समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे। उसे न तो इस्लामिक रीति रिवाज की रवायतें पता थीं और न ही सलीका। आगे क्या करना है ? ऐसा कुछ सोचने वाला था कि सामने से अली जरार आता दिखा । वह काफी दूर था मगर दिख रहा था क्योंकि जिस जगह वह था, वहां कब्रिस्तान से लगी बाउंड्री के बाहर गली के खंभे के हैलोजेन की रोशनी अंदर तक आ रही थी।
अली जरार को आते देख उसे थोड़ी घबराहट हुई । वह यहाँ कोई बवाल या बखेड़ा नहीं चाहता था । उसे थोड़ी घबराहट हुई सो वह अंधेरे में हो लिया कि अली जरार चला जाये तो वह सोचे कि आगे क्या करना है ?
वह अंधेरे में दुबका रहा और अली जरार चला गया। जब उसे इत्मीनान हो गया कि अली जरार दूर निकल गया होगा। तो वह उजाले में आकर सोचने लगा कि अब क्या करना है ?
“यहां कैसे आप ? बड़े आदमी और कट्टर हिन्दू गरीब मुसलमानों के कब्रिस्तान में ” पीछे से एक आवाज आई ।
उसने घूमकर देखा तो अली जरार खड़ा था ।
“शबीहा को मिट्टी देने आए हैं । मरने से पहले भी नहीं आये और मरने के बाद भी बड़ी देर कर दी आपने आते आते ” अली जरार ने तंज भरे स्वर में कहा।
“नहीं वो मैं ,वो मैं जरा इधर से ” वह बोलते हुए गड़बड़ा गया।
“उसी से मिलने आये हैं ना, वरना रात के अंधेरे में इन गरीबों के कब्रिस्तान में आना आपके स्टैंडर्ड के खिलाफ है । शबीहा आपका जाती मामला थी इसीलिए आप आये हैं। वरना यूँ छुपकर चोरों की तरह नहीं आते । अव्वल तो किसी मुसलमान की मौत पर आपको कोई गम नहीं होता अलबत्ता खुशी होती है । लेकिन दुनिया को दिखाने के लिए अगर मातम पुर्सी करनी जरूरी है तो आपका ड्राइवर फूल लेकर आता ,आप नहीं । लेकिन शबीहा उसकी तो बात ही और थी” अली जरार ने फिर तंज भरे लहजे में कहा।
“तुम गलत समझ रहे मेरा मतलब है कि आपको गलतफहमी हुई है। मैं तो यहाँ ऐसे ही इंसानियत के नाते ” ये कहते हुए उसके मुंह से आगे के बोल ही न फूटे।
उसे कुछ और नहीं सूझा तो मैंने सर झुका लिया ।
थोड़ी देर यूँ ही बीत गए ।
अली जरार ने उसका हाथ पकड़ा और आगे आगे चल पड़ा । कब्रिस्तान के आखिरी छोर पर ले जाकर एक कब्र के सामने उसने थोड़ी सी मिट्टी उठाई और उसके हाथों में रख दी ।
अली जरार ने हाथ उठाकर फातिहा पढ़ना शुरू कर दिया । उसने अली जरार की तरह हाथ तो उठा तो लिए मगर वो कौन सी चीज पढ़ रहा था जब ये जान नहीं पाया तो कब्र के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया ।
फातिहा खत्म हुआ तो अली जरार ने इशारा किया । उसके इशारा करने पर उसने हाथ में ली हुई मिट्टी शबीहा की कब्र पर चढ़ा दी और उसे अपने तरीके से अंतिम प्रणाम करके मुड़ गया ।
इस बार वह तेज कदमों से आगे चल रहा था। क्योंकि वह नहीं चाहता था कि अली जरार ये देख सके कि उसकी पत्नी की मौत पर किसी गैर की आँखों से आँसू बह रहे थे। अली जरार कभी उसके बगल हो लेता तो कभी पीछे रह जाता।
गेट पर पहुंचने के बाद उसने अली जरार को अलविदा कहने की सोची।अब तक उसके आंसू सूख चुके थे। घूम कर उसने अली जरार से हाथ जोड़कर कुछ कहना चाहा तो अली जरार ने उसका हाथ पकड़ लिया । उसकी आंखें आंसुओं से डबडबा गईं वह धीरे से बोला –
“आपने मेरी हँसती खेलती ज़िंदगी तबाह कर दी राय साहब। आपने सबीहा को अपने इश्क के जाल में इसलिये फाँसा कि आप मुसलमानों से बदला ले सकें। आपके घर की लड़की को कभी कोई मुसलमान भगा ले गया था तो उस बात का बदला लेने के लिए आपको मेरा ही घर और मेरी ही बीवी मिली थी। किसका बदला किस से लिया आपने ? जानते हैं वह कैंसर से नहीं मरी बल्कि आपके किसी छल की वजह से वह जीना नहीं चाहती थी ”।
उसने मन ही मन गुणा भाग किया और इस नतीजे पर पहुंचा कि इस वक्त अली जरार को दी गई किसी भी किस्म की सफाई उसके खिलाफ ही जाएगी।
उसने धीरे से अली जरार से अपना हाथ छुड़ा लिया । उसने अली जरार कंधे पर सांत्वना देने के लिए हाथ रखा और फिर उससे विदा लेकर चल पड़ा ।
अपनी गाड़ी में आकर बैठने के बाद वह जी भर के रोया । आंखे बंद कर लीं तो ऐसा लगा कि मानो शबीहा उसके सीने के बालों को सहलाते हुए वही बात बोली जिस बात पर उसे काफी एतराज हुआ करता था ।
शबीहा कहती थी कि
“राय ये बताओ यार, मुसलमानों से इतनी नफरत रखने के बावजूद तुम मुझसे इतनी मोहब्बत कर कैसे लेते हो ” ?
एक झटके में उसने आँखे खोल दीं , वहाँ कोई न था । कोई होता तब तो दिखता ,शबीहा तो अब ये फानी दुनिया छोड़कर जा चुकी है । उसने पीछे मुड़कर देखा तो अली जरार उसकी गाड़ी के पीछे दूर खड़ा उसे असमंजस से देख रहा था ।
उसने गाड़ी को गियर में डाल दिया । गाड़ी चल पड़ी। वह जानता था कि अली जरार की आंखें तब तक उसका पीछा करती रहेंगी जब तक उसकी गाड़ी नजरों से ओझल नहीं हो जाएगी।
अब यह बात मैं शबीहा को भी नहीं समझा पाया था तो अली जरार को कैसे समझाऊं कि मैं किसी का बदला नहीं ले रहा था बल्कि मैं तो खुद बदल चुका हूँ।
समाप्त।
