दिसंबर, 2025

जीवन पार्क, उत्तम नगर, दिल्ली
(लेखक परिचय: अभी तक आपकी 4 कविता संग्रह, 4 उपन्यास, 3 कहानी संग्रह, एक लघुकथा संग्रह, एक आलेख संग्रह और एक आत्मकथा प्रकाशित हो चुकी है। इनके अतिरिक्त अनेक रचनाएँ साझा संग्रह में प्रकाशित हो चुकी हैं। अनेक पत्र पत्रिकाओं एवं वैबसाइट में सतत प्रकाशित होती रहती हैं। सृजन, नई जंग, हम सब साथ साथ, अभिनव इमरोज जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में बतौर सह-संपादक/अतिथि संपादक सहयोग।
राजेंद्र यादव हंस लघुकथा सम्मान, हिंदी अकादमी मुंबई द्वारा साहित्य साधना सम्मान सहित अनेक सम्मानों से आप सम्मानित हो चुके हैं। आपकी रचनाएँ तेलुगु, उड़िया, कन्नड़, नेपाली, इत्यादि भाषाओँ में रचनाएँ अनुदित हो चुकी हैं।)
घर यानी चारदीवारी से निर्मित आकाश। बंद दीवारें, बिना खिड़की के — और छत में एक छोटा-सा छेद, जिससे सूरज की रोशनी, धूप की हल्की तपिश और कभी-कभार बारिश की चंद बूंदें नाज़िल हो जाया करती हैं। इस सीमाओं में बंधे रहस्यमयी आकाश के कुछ कायदे-क़ानून हैं, जिन्हें समाज-निर्मित कहना ही उचित होगा, क्योंकि इन्हें किसने बनाया, यह आज तक रहस्य ही बना हुआ है — जैसे कंचन का मन मेरे लिए रहस्य है।
इन समाज द्वारा बनाए कायदों ने कितने व्यक्तित्व नष्ट किए हैं, इसका अनुमान लगाना भी नामुमकिन होगा। मैंने जब कभी विचारों को चारदीवारी से ऊँचा करना चाहा, कंचन— हाँ, कंचन— ने मुझे मेरी हदें निर्धारित करने की चेतावनी दे डाली।
मेरा घर, जो शायद घर बना ही नहीं, आज अपनी ऊँची दीवारों के साथ खड़ा अट्टहास कर रहा है। यह अट्टहास धीरे-धीरे चीख़ में तब्दील हो उठता है। उसी घर के कोने में एक छोटा-सा कमरा है। कमरे के दायीं ओर एक टूटी सी मेज़, जिसकी हालत मेरी हालत से मेल खाती है। साथ में एक कुर्सी, जो उतनी ही पुरानी है जितना पुराना मेरा अस्तित्व — अर्थात मैं।
मैं — अर्थात आज़ाद ख़यालों का, पुरानी कलम का, अदना-सा सिपाही। मेरी सिपाहियत इस बात में है कि हर एक ग़लत बात, जो सुधार की गुंजाइश लिए होती है, मेरे लिए नागवार गुज़रती है। तब मैं उसे व्यवस्था के अनुकूल या विपरीत देखने लगता हूँ। हालांकि यह दीगर बात है कि मैं स्वयं को व्यवस्था में होकर भी उसका हिस्सा मानने से परहेज़ करता हूँ।
व्यवस्था समाज के चंद लोगों की बनाई रांड है, जिससे हर वर्चस्वशाली मौका लगने पर सहवास (अक्सर बलात्कार) कर लेता है। ऐसी व्यवस्था के साथ किसी घटना की तारतम्यता को देखना या सूत्र खोजना मुझे स्वयं भी मूर्खता लगता है। तब मेरा मन खीज उठता है, जो अक्सर चीख़ में बदलकर मेरे रोम-रोम को झकझोर देता है।
आज मैं जब कमरे की टूटी मेज़ के साथ रखी पुरानी कुर्सी पर बैठा हूँ, तो मेरे घर की दर्दनाक चीख़ मेरे अंदर उभरती प्रतीत होती है। मुझे आभास होता है जैसे यह चीख़ मेरे अकेलेपन की चीख़ है।
मैं अपने अकेलेपन को खोजने लगता हूँ। उससे बतियाना चाहता हूँ। अकेलापन ख़ामोश है — निश्चल, नि:शब्द। अचानक एक हलचल होती है। मैं पाता हूँ अपने होठों का एकाएक कंपकंपाना। शायद अकेलापन कुछ कहना चाहता है। भीतर से शब्द सक्रिय होते मालूम होते हैं — जैसे रुई का एक फाहा अचानक हृदय की तकली पर थिरक उठा हो और एक मोटा, ऊबड़-खाबड़ धागा निकला हो, जो महीन होना ही नहीं चाहता।
शब्द वायु में प्रवाहित होते हैं —
‘क्यों, मेरा मौन भंग करने पर आमादा हो?
‘मैं? कहाँ?
‘जानते हो, मैं कौन हूँ?’
‘अ… हाँ… तुम… और कोई नहीं… मेरा अकेलापन।’
‘मैं था कभी तुम्हारा अकेलापन। लेकिन आधुनिकता और पुरातन के बीच झूलते तुम्हारे उद्गारों ने मुझे अकेले रहने नहीं दिया… तुम मेरे जीवन के अकेले ज़िम्मेदार हो।’
‘आ… हाँ… शायद मैं ही… लेकिन…’
‘लेकिन क्या? तुम्हारी ख़ामोशी कंचन को खलती रही और तुम… तुम उसके सपनों से अंजान बने रहे या अंजान बनने का स्वाँग रचते रहे। कब तक, आख़िर कब तक कोई तुम्हारी ख़ामोशी को बर्दाश्त करता?”
‘ओह! प्लीज़ बंद करो ये वार्तालाप। मैं उसे याद करना नहीं चाहता। कंचन एक बीता हुआ कल है — मात्र कल। और भूत के सहारे चलना मेरी फ़ितरत नहीं। मैं फिसलन का आदी नहीं। भूत सिर्फ़ फिसलन देता है।’
‘यही तो तुम्हारी विवशता है… तुम कितनी ही बातों को झुठलाने का बहाना करते हो, पर जानते हो सच क्या है? सच ये है कि तुम कंचन को भुला नहीं पाए। चलो, थोड़ी देर के लिए मैं अपने अस्तित्व को झुठला देता हूँ — मैं, यानी तुम्हारी ख़ामोशी, तुम्हारा अकेलापन।’
अचानक मुझे चेतना आती है। मैं अनुभव करता हूँ — मेरे शरीर पर पसीने की बूंदें चू पड़ी हैं। मेरा कुर्ता गीला है और बढ़ी हुई काली-सफ़ेद दाढ़ी से पानी की धारा गर्दन तक आ गई है। मेरी साँसें फूल रही हैं। मैं जैसे स्वयं पर नियंत्रण खोता जा रहा हूँ। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है — जैसे यह अमावस की रात हो।
मेरा मस्तिष्क शून्य में विचरण करने लगता है। यह विचारों की शून्यता का क्षण है। मैं सब कुछ भूल जाना चाहता हूँ — स्वयं को, अपने अस्तित्व को, कंचन को। पर भूलने की हर कोशिश नाकाम रहती है। अँधेरा अचानक मुझे मेरे अतीत में धकेल देता है…
कंचन ने कहा— ‘सुदीप, कल मैं अपनी बहन की शादी में जा रही हूँ। तुम नहीं चलोगे?’
‘कंचन, तुम मेरी व्यस्तताएँ अच्छी तरह जानती हो। सरकारी नौकरी की मजबूरियाँ भी तुम्हारे सामने हैं। मैं अपने कार्यालय में नियमित जाता हूँ, बिना किसी नागा के। मेरे लिए छुट्टी का पर्याय केवल किसी परीक्षा का देना है। तुम चली जाओ, मैं नहीं जा पाऊँगा।’
‘क्या तुम सोच-समझकर कह रहे हो? मेरी बहन की शादी है और हमारी शादी को अभी कितने दिन हुए हैं। अगर मैं शादी के एक साल बाद अकेले अपने मायके जाऊँगी, तो लोग क्या कहेंगे?’
‘लोग… वही लोग। किन लोगों की बात कर रही हो?’
‘सुदीप, क्यों बहस पर उतारू हो? आखिर कारण क्या है कि तुम मेरे साथ जाना नहीं चाहते? मेरे माता-पिता भी चाहते होंगे कि उनका दामाद उनके दर पर आये। थोड़ी-सी आवभगत से उन्हें कुछ धर्म लाभ मिल जाए, तुम्हारा कुछ घट नहीं जायेगा।’
‘देखो, मैं न तो तुम्हें समझाना चाहता हूँ, न ही ऐसा कर पाऊँगा। तुम अपने निर्णय में स्वतंत्र हो, मैंने कभी तुम्हें किसी काम से रोका भी नहीं। तुम चली जाओ। लेकिन हाँ, मुझे कभी बाध्य मत किया करो। यदि मैं तुम्हें स्वतंत्र जीवन जीने दूँ, तो जाहिर है अपने लिए भी वैसा ही सोचता हूँ।’
‘यही तो दुःख है, सुदीप! यही तो दुःख है। मैं ऐसी स्वतंत्रता नहीं चाहती। मैं चाहती हूँ कि तुम मुझे रोको, टोको। मेरी गलती पर मुझे डाँटो, मुझ पर गुस्सा करो। तुम्हारी बातें सुनकर मुझे लगता है कि तुम पत्नी के मर्म को समझते ही नहीं। कोई भी पत्नी नहीं चाहती कि उसका पति उसे इतनी आज़ादी दे।’
‘नए जमाने की औरत भी क्यों पुराने विचारों का लबादा ओढ़े रहती है? आज़ादी नहीं चाहिए तो फिर क्या चाहिए? अपने आदर्श और सिद्धांत छोड़ दूँ, अपने अंदर के बुद्धिजीवी को नष्ट कर दूँ? देखो, कंचन, मैं ‘मैं’ ही बना रहना चाहता हूँ। इस समाज के निकृष्ट प्राणियों से मेरी तुलना मत किया करो। यदि पत्नी पर हुक्म चलाना, उसकी आज़ादी को नियंत्रण में रखना, उसे अपना गुलाम बनाना पुरुषत्व है, तो मुझे वैसा पौरुषत्व स्वीकार नहीं है।’
‘तो तुम कहना चाहते हो कि हम दोनों एक ही चारदीवारी के नीचे अपने-अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ जीवन गुजारें।’
‘आख़िर इसमें हर्ज क्या है?’
‘हर्ज है, हर्ज है सुदीप। मेरी भी कुछ इच्छाएँ हैं, भावनाएँ हैं। मैं चाहती हूँ कि हम साथ घुमें-फिरें, घंटों बात करें। नदी किनारे जाएँ, पहाड़ों की ऊँचाई को नापें। झरनों की कल-कल करती आवाज़ सुनें और उसे गुनगुनाएँ। तुम रोज़ मुझे अपनी बाँहों में भर चुम्बन करो। हम एक-दूसरे में खोए रहें। तुम रति-क्रीड़ा में महारत दिखाओ और मैं तुम्हें चरम तक ले जाऊँ। लेकिन तुम्हारे विचार तुम्हें मुझसे कितना दूर ले जाते हैं! कितने दिन हो गए जब हमने सहवास किया?”
‘पहली बार जब मैं डोली में बैठ तुम्हारे घर आई थी और तुम अपने दोस्तों के बीच देर रात तक बैठे रहे, तब मैंने तुम्हारी किताबों में कामसूत्र देखकर रोमांच महसूस किया। उस वक्त तुम मुझे किसी कामदेव की छवि में नज़र आए, लेकिन आज जब तुम सहवास के लिए पहल नहीं करते, तो मेरा मन खीज उठता है। पिछली बार भी जब मैं खुद को रोक नहीं पाई थी, तो मैंने प्रस्ताव रखा। स्त्रियाँ सामान्यतः पहल नहीं करतीं।’
‘ओह कंचन! तुम किस दुनिया में जी रही हो। तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं शारीरिक मिलन को जीवन का पर्याय नहीं मानता। आखिर, मन का मिलन भी तो है।’
‘यही तो दिक्कत है, तुम शरीर की आवश्यकता, उसके सच को नकारने की कोशिश करते हो, जबकि…’
‘शरीर मात्र शरीर है, उसमें मन का अंश होता है।’
‘किस मन की बात कर रहे हो, सुदीप, जिसमें तुमने इंसानों की जगह कोरे आदर्श ठूँस रखे हैं।’
‘कंचन, बेकार की बहस से कुछ हासिल नहीं। तुम शरीर की महत्ता पर जीवन जीना चाहती हो, और मैं… मैं शरीर के अस्तित्व को ही स्वीकार नहीं करता। काम-वासना इंसान को जीने के काबिल नहीं छोड़ती। शरीर को महत्व देकर मैं बुद्धि के साथ अन्याय नहीं कर सकता।’
‘लेकिन मैं अपनी कामेच्छा का क्या करूँ? मेरा शरीर कामाग्नि में तपता है, मैं इस अग्नि को सहन नहीं कर पाती। इस पिपासा पर अपने स्पर्श की ठंडी बारिश कर दो। मुझे तुमसे कुछ नहीं चाहिए।’
‘मैं स्त्री को सौम्यता की मूरत मानता हूँ। स्त्री मेरे लिए पूजनीय है, भोग्य-पण्य नहीं।’
‘मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, सुदीप।’
‘पत्नी होने से तुम स्त्री नहीं रह पाई क्या? स्त्री की पूज्यता को तजना मेरे बूते की बात नहीं।’
‘अगर मुझे अपने साथ केवल एक बहन की तरह रखना था, तो शादी ही क्यों की? आखिर मेरी जिंदगी बर्बाद करने का तुम्हें क्या हक था?’
‘क्या शरीर की भाषा में बात करना ही जीवन की आबादी है?’
‘सुदीप! मैं हमेशा तो नहीं कहती, पर कभी तो…’
‘कंचन! तुम्हें वासना को शांत करना है न, तृप्ति चाहिए न, वह तो तुम कहीं भी पा सकती हो।’
‘तड़ाक!’ — एक जोरदार थप्पड़ कंचन ने मेरे गाल पर जड़ दिया। मैं स्तब्ध खामोश रहा। उस वक्त कोई उत्तेजना नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं। कंचन का यह थप्पड़ मुझे मेरे अस्तित्व पर पड़ता नज़र आया।
शाम तक उसने अपना सामान बांधा और ऑटो पकड़ रेलवे स्टेशन का रुख किया। उसने शायद सोचा होगा कि मैं उसे रोकूंगा; मैंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। उसने वापसी का रुख नहीं किया।
मेरा अकेलापन मेरा साथी बन गया। जैसा कि आज है। मैं कुर्सी से उठता हूँ, कमरे में चक्कर लगाता हूँ। हल्की सी रोशनी नज़र आती है। करीब रात्रि के 2:00 बजे का समय हो चला था। शायद ये तारों की रोशनी है, जिसमें आशा-निराशा का मिश्रण घुला है। मेरा गला सूख रहा था। एक कोने में सुराही रखी है। मैं गिलास उठाता हूँ और सुराही में डुबो देता हूँ। पानी शायद कम है। सुराही को थोड़ा टेढ़ा करने पर मात्र इतना ही पानी आ पाता है कि गला तर हो सके। गिलास वापिस सुराही पर उल्टा रख, दो कदम आगे बढ़ता हूँ।
एकाएक जेब की ओर हाथ जाता है। सिगरेट का पैकेट निकाल सुलगा, कश लगाता हूँ। सिगरेट जितनी तेजी से जलती है, उतनी ही धीरे-धीरे खत्म होती है। मुझे अनुभव होता है — सिगरेट और जिंदगी में कितनी समानता है। स्मृति का चलचित्र मस्तिष्क-पटल पर उभर आता है।
बड़े भैया के घर एक फूल सी बच्ची ने जन्म लिया था। बच्ची एक बड़े ऑपरेशन के बाद आई। भाभी नर्सिंग हॉस्पिटल के ए. सी. रूम में थीं। पूरा परिवार इकठ्ठा था। सब खुशी में मग्न, लेकिन मैं कहीं खोया हुआ था। माँ ने मेरी ओर ध्यान दिया और बोली — ‘क्या बात है सुदीप, तुम अकेले और परेशान क्यों हो?’
मैं मौन रहा। बिना कुछ बोले नर्सिंग होम से बाहर निकल आया। भैया बेटी की खुशी में इतने मग्न थे कि उन्होंने देखा भी नहीं कि मैं कब वहाँ से निकला। घर आया, भूख हावी थी, लेकिन मानसिक शून्यता ने मुझ पर कब्ज़ा कर लिया। कंचन की याद आई — उसने पेट के नीचे की भूख का, उस तड़प का जिक्र किया था।
किचन खोला, डिब्बे टटोले। सब कुछ खाली। मेरी ज़िंदगी भी खाली डिब्बों जैसी लगी। कमरे में लौटकर कुर्सी पर बैठा। मन को स्थिर करने का प्रयास किया, लेकिन चिंता काँपने लगी।
तभी डोर बेल बजी। बाहर प्रकाश कमरे के अंधेरे को कम कर रहा था। माँ खड़ी थी। कमरे में दाखिल हुई और बोली — ‘सुदीप बेटा, इतने अँधेरे में बैठे हो, लाइट क्यों नहीं जलाई?’
कमरा रोशनी से भर गया। माँ ने मेरे गालों पर बहती आंसुओं को महसूस किया और सिर सहला दिया। मैंने हिचकियाँ लेते हुए कंचन और हमारे बीच का सच माँ के सामने खोल दिया।
माँ हैरान, परेशान, मुझे सांत्वना देती रही। महसूस हुआ — मेरा शरीर तप रहा है। ‘बेटा, तुझे बुखार है। तेरा शरीर आग की तरह तप रहा है। अब तो डॉक्टर भी नहीं मिल पाएगा।’
माँ ने पानी में इलायची डालकर पिलाया, किचन में जाकर काढ़ा बनाया। बचपन की याद ताजा हुई — जब भी बुखार होता, माँ काढ़ा बना दिया करती थी। माँ की देखभाल में बचपन की गर्माहट और सुरक्षा महसूस हुई।
अगले दिन सुबह, चाय बनाकर माँ चली गई। मैं घर में अकेला रहा। कंचन लौट आई, पर मेरे भीतर कोई हलचल नहीं हुई। उसने चाय बनाई, मेज पर रख दी, लेकिन छुआ तक नहीं।
रात को उसने खाना बनाया, मैं घूमकर 11 बजे घर आया। स्थिति से पता चला कि कंचन सो चुकी थी। मैंने प्लेट में थोड़ी सब्जी निकाली, दो चपाती खाई, दो गिलास पानी पी और चटाई पर लेट गया।
सुबह मैंने कहा — ‘बाबुजी अकेले हैं, खाना नहीं बना पाएंगे। तुम गाँव चली जाओ। बड़ों की सेवा करना हमारा फ़र्ज़ और धर्म भी है। ये पुण्य कमाने का अच्छा अवसर है।’
‘सुदीप, पुण्य? जब मेरे साथ चलने की बात थी, तब सिद्धांत थे। अब बाबूजी की बात है, पुण्य याद आ रहा है। कितने ढोंग सीखे हैं तुमने।’
कंचन ने फिर तलाक का कागजात साइन किया और ट्रेन पकड़ी।
कंचन के जाने के बाद घर में पसरा सन्नाटा केवल चारदीवारी की खामोशी नहीं थी; यह मेरे भीतर के खालीपन की दहाड़ थी। कुर्सी पर बैठे-लेटे, मैं अपने हाथों को देखता रहा। हाथ वही, जो कभी कंचन की नाजुक त्वचा को छूते थे, आज निष्क्रिय पड़े थे। हर अंग, हर पेशी जैसे मेरी इच्छाओं और भावनाओं के भार से बोझिल हो चुकी थी। कमरे का छोटा सा छेद, जिसे कभी मैं आकाश का छोटा-सा फलक समझ बैठता था, आज मेरे भीतर के सीमित संसार का प्रतीक बन गया था। आकाश सिकुड़ता गया, और मेरे भीतर खालीपन के विशाल महासागर में डूबता गया।
सुबह हुई, और माँ ने चाय बनाकर दी। उसकी मुस्कान में वही बचपन की चिंता और स्नेह झलक रहा था। लेकिन स्नेह भी अब पूरी तरह मेरे भीतर नहीं उतर पाता था। कंचन के जाने के बाद मेरे शरीर और मन के बीच एक दूरी बन गई थी, जिसे मैं न तो पाट सकता था, न ही स्वीकार। मैं खड़ा हो गया, खिड़की के पास, और बाहर के मौसम को देखता रहा। सूरज की हल्की रौशनी, पेड़ों की धीमी सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट—सब कुछ एक सामान्य सुबह जैसा लग रहा था, लेकिन मेरे भीतर हर चीज़ फीकी और बेरंग थी।
किचन में जाकर कॉफी बनाई, और धीरे-धीरे पीता रहा। भाप मेरे चेहरे को छू रही थी, गर्माहट और ठंडक का मिश्रण जैसे मेरी यादों और वर्तमान के बीच टकरा रहा हो। एक कप के अंदर मेरी ज़िंदगी, मेरी तड़प और मेरी अधूरी इच्छाएँ समाहित हो गईं थीं। कंचन के शब्द— ‘तुम आदित्य क्यों नहीं बन जाते?’—अब हर गली, हर कमरे, हर सांस में गूंज रहे थे।
मैंने अपनी कुर्सी पर बैठकर यादों का सफ़र तय किया। बचपन, माँ की देखभाल, बड़े भैया के घर की खुशियाँ, मेरी अपनी असफलताएँ — सब कुछ एक फिल्म की तरह आंखों के सामने घूम रहा था। महसूस हुआ कि मैं कभी समाज का हिस्सा नहीं बन पाया। रिश्ते, प्यार, इच्छाएँ — सब मेरे लिए केवल एक सन्नाटे में फंसी हुई आह की तरह थीं।
दिन ढलने लगा, और कमरे में लंबी छाया पसर गई। मैं खिड़की पर बैठा रहा, हाथों में कॉफी का कप लिए। हर घूंट मेरे भीतर की तड़प को और गहरा कर रहा था। महसूस हुआ कि कंचन का जाना केवल शारीरिक दूरी नहीं थी; वह मेरे भीतर की दुनिया, मेरे सपनों, मेरी कल्पनाओं तक की दूरी बन गई थी। मैं समझ गया —कभी जो चाहा, जो पाया नहीं, वही अब सबसे करीब है।
रात ने चुपके से कमरे पर अपना काला परदा डाल दिया। तारों की रौशनी अब मेरे लिए सिर्फ़ यादों का प्रतिबिंब थी। मैं खड़ा रहा, अँधेरे और उजाले के बीच, खुद से संवाद करता हुआ — ‘शायद यही जीवन है, सीमाओं में बंधा, अपने-अपने आकाश के तहत। कभी मिलना, कभी खोना, और फिर केवल यादों में जीना।’
मौन में, अकेलेपन के भीतर, मैं अपने अस्तित्व को महसूस करता रहा। कोई चीख़ नहीं, कोई रोष नहीं — केवल ख़ामोशी और उसकी गंभीर उपस्थिति। कंचन अब मेरे आसपास नहीं थी, लेकिन उसका प्रभाव, उसकी बातें, उसकी चाहतें, और उसका विदा — सारा अनुभव मेरे अंदर गहराई से बस गया था।
और फिर, जैसे अँधेरे में एक धीमी रौशनी फैलती है, मैंने महसूस किया कि इस अकेलेपन में भी जीवन की एक अनकही गति है। सीमाओं और आकाश की खामोशी में, मैंने अपने भीतर के छोटे-छोटे आशा के तारे ढूँढ लिए। कंचन कभी लौटकर मेरे पास नहीं आएगी, पर उसका अस्तित्व, उसकी स्मृतियाँ, मेरी दुनिया का हिस्सा बन गई हैं।
मैं खड़ा रहा, आँखों में हल्की नमक की चमक, गहरी सांस लेकर, और धीरे-धीरे यह स्वीकार किया — ‘हाँ, मैं अकेला हूँ। पर यह अकेलापन, यह ख़ामोशी भी मेरी है, मेरी सीमाओं का आकाश है, और मैं इसे अपने अस्तित्व का हिस्सा मानता हूँ।’
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