मार्च 2026

वसुंधरा एनक्लेव, दिल्ली
महिलाओं के योगदान का वर्णन कर सके ऐसा कोई शब्द नहीं ढूँढ पा रही हूँ। कबीर दास जी की दोहा है
“सात समंद की मसि करौं लेखन सब बन राय
धरती सब कागद करौं , हरि गुण लिखा न जाए”
महिलाओं के लिए भी यह दोहा सटीक बैठता है। ऐसा कोई भी क्षेत्र है ही नहीं जहाँ महिलाओं का योगदान ना हो। आधुनिक समय में तो महिलाओं की जिम्मेदारी और बढ़ गई है । वह घर संभालने के साथ-साथ बाहर भी नौकरी करती है और दोनों जगह अपना शत-प्रतिशत ध्यान देती है। उज्जवल भारत के भविष्य के निर्माण में महिलाएँ हर जगह छाई हुई है, जमीन से आसमान तक, हर जगह महिलाओं का योगदान है।
यह सच है कि महिलाएँ हर जगह दिल से योगदान करती हैं लेकिन जितनी तारीफ और सम्मान उनको मिलना चाहिए अभी भी को नहीं मिलता है, कुछ ही भाग्यशाली महिलाएँ हैं जिनको सम्मान और प्रोत्साहन मिलता है, नहीं तो अधिकतर महिलाएँ संकीर्ण मानसिकता की शिकार हो जाती है। उनकी सफलता को आरोपों के बादल से ढक दिया जाता है जिसका परिणाम होता है कि अधिकतर महिलाएँ हीन भावना से ग्रसित होकर गलत कदम उठा लेती है।
अभी भी कुछ पुरुषों की मानसिकता यही है कि घर का काम महिलाओं का काम है। यह पुराने जड़़त्व विचार है। जबकि उन्हें सोचना चाहिए कि महिलाएँ घर के साथ-साथ बाहर भी काम करती है। दोनों जगह संभालती है तो उसे भी मदद की जरूरत होगी और मदद मिलने से ही स्वच्छ परिवार बनेगा। जहाँ पुरुष वर्ग इस बात को समझते हैं वहाँ घर स्वर्ग है और जहाँ नहीं समझते वहाँ कलह का अड्डा बन जाता है। इतना ही नहीं, ऐसे स्थान पर बचपन जहरीला हो जाता है। यह बहुत चिंता का विषय है कि बच्चे ही हमारे भविष्य के नींव हैं यदि वही जहरीले हो जाएंगे तो, इस समाज का पूरा भविष्य ही इस जहरीली सोच से ग्रसित होकर सभी नव निर्माण को रोक देंगे। इस सब पर हमें चिंतन करना जरूरी है।
महिलाएँ तो धरती माँ का प्रतीक है। जिस तरह से धरती पर उगे घास को काटते हैं, पैरों से रौंदते हैं या कुचलते हैं, तब भी धरती माँ बिन बीज के हरियाली अच्छादित कर देती है। यहाँ तक कि हम कंकड़ सीमेंट से सतह को ढक देते हैं फिर भी दरारों से घास या छोटे-छोटे पौधे निकलने लगते हैं। महिलाएँ भी इसी तरह से निरंतर निज प्रयास से घर को सुखी घर बनाने में लगी रहती है। महिलाएँ चाहे शिक्षित वर्ग की हो या अशिक्षित वर्ग की हो, बड़े़ तबके के हो या छोटे तबके के हो योगदान किसी का कम नहीं है। अतीत की महिलाएँ हों या वर्तमान की, जमीन पर काम करें या आसमान में, सभी के योगदान का अपना-अपना महत्व है।
इंसान तो क्या, जग जननी जगदंबा स्वयं अवतार लेकर बता दी है कि महिला के हर रूप में, मैं ही हूँ। दुख तब होता है जब लोग गृहिणी महिला के योगदान को उपेक्षा की नजर से देखते हैं। अक्सर यह पंक्ति सुनने को मिलता है “तुम घर में काम के अलावा करती ही क्या हो?” हम भूल जाते है कि पूरे परिवार का दायित्व एक गृहिणी महिला के कंधे पर टिका होता है। वह स्वयं घर के चारदीवारी में रहकर परिवार के सदस्यों को उड़़ने के लिए स्वच्छन्द आकाश देती है। हम तो कहते हैं कि एक गृहिणी महिला का योगदान कहीं ज्यादा होता है वनिस्पत बड़े़-बड़े मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाले पुरुषों से।
आधुनिक समय में महिलाएँ अपना घर संभालती हुई नौकरी भी करती है। देखा-देखी में महिलाओं की योगदान की परिभाषा बदलती जा रही है। अधिकतर आर्थिक दृष्टि से योगदान को परिभाषित किया जाता है।
पुरुष जब दफ्तर से आते हैं तो परिवार के अधिकतर सदस्य उनके आवभगत में लग जाते हैं लेकिन वहीं महिला जब ऑफिस से आती है तो उनके लिए घर में कामों की भरमार होती है। एक मिनट भी वह आराम से नहीं बैठती है काम करने में लग जाती है। उन्हें तो इतना भी सुकून नहीं मिलता है कि एक पल बैठ के शांति से वह चाय पी सके। सबके लिए चाय बनाकर बांटते-बांटते जब अपनी बारी आती है तो चाय ठंडी हो जाती है।
कभी-कभी सोचती हूँ कि यह कैसा विकास है! कैसी सुख सुविधा! जहाँ नैतिकता का पतन मानवता का हनन! चिंतन करती हूँ तो हमें लगता है कि आधुनिक महिलाओ से ज्यादा पहले की महिला बिना कुछ सुख सुविधा के सतत परिवार की देखभाल में तल्लीन रहती थी। तब भी आधुनिक महिला से ज्यादा संतुष्ट और सुकून भरी जिंदगी जीती थी। क्योंकि सभी साथ रहती थीं एक दूसरे को हाथ बटाती थीं। काम को बोझ नहीं बल्कि गीत गाकर साथ में खुशी-खुशी करती थी। उन्हें अपने लिए भी वक्त मिलता था जिसमें सिलाई, कढ़ाई, गीत नाद सबके लिए समय मिलता था और मन की शांति ज्यादा रहती थी।
जिस तरह से धरती को धन-धान्य से सम्पन्न बनाने के लिए हम उसमें उर्वरक डालते हैं तो हमारी धरती शस्य श्यामला हो जाती है। उसी तरह महिलाओं को सम्मान स्नेह और प्रोत्साहित करेंगे तो हमारा घर, परिवार और राष्ट्र सब शुभता के किरण में नहाने लगेंगे। हर तरफ सुख शांति होगी। सही कहा गया है कि “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।”
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