दिसंबर, 2022

ग्राम-कैतहा, पोस्ट-भवानीपुर
जिला-बस्ती, उ. प्र.
वर्षों से शहर में रहते हुए भी
मेरा गाँव से रहता जुड़ाव है
अक्सर गाँव आता-जाता रहता हूँ
इसीलिए अपने गाँव से लगाव है
बच्चों के ग्रीष्मकालीन एवं शीतकालीन छुट्टियों में
कुछ दिन गाँव जाकर परिवार संग रुकता हूँ
अपने खेत, खलिहान और बाग आदि देखता हूँ
उनसे मन की बातें करता हूँ, उनकी बातें सुनता हूँ…
अब आम का वो बाग नहीं रहा
जिस पर सिंदूरी, लोढ़वा और कई तरह के आम
बचपन में हम लोगों को खाने को मिलते थे
आम के पेड़ों पर हम झटपट चढ़ जाते थे
जेठ की दुपहरी में जब पके हुए आम
डालियों से गिरते थे
उसे पाने को हम लोग तेजी से लपकते थे
आंधी आने पर ढ़ेरों आम पेड़ों से गिर पड़ते थे
उसे पाने के लिए झगड़ा भी किया करते थे
अब उस आम के बाग के सारे पेड़ कट कर
खेतों के रूप में बदल गए हैं…
अब मेरे गाँव की गलियाँ पिच हो गई हैं
विकास की किरणें अब गाँव में दिख रही है
लालटेन और ढिबरी तो अब जैसे गुम हो गई हैं
दूधिया रोशनी में अब गाँव भी जगमगा रहे हैं
चौराहों पर अच्छी दुकानें खुलते जा रहे हैं
गाँव के बूढ़े-बुजुर्ग-हमउम्र तो पहचानते हैं
पर गाँव में नई पीढ़ी के बच्चे
मुझे अपने गाँव का नहीं मानते हैं
आने वाले कुछ वर्षों में मेरे बच्चे और गाँव के बच्चे
एक दूसरे को नहीं पहचान पाएँगे
इक दूजे को नहीं जान पाएँगे
कि दोनों का गाँव एक है…
अब तो बच्चे गाँव से निकलकर
शहरों-महानगरों से होते हुए विदेशों की राह
पकड़ कर वहीं बस जा रहे हैं
आने वाले समय में
शायद हमारे बच्चों के बच्चे
अपने गाँव को ढूढ़ने और जानने के लिए
गूगल का सहारा लेंगे
ये हमारे पूर्वजों का गाँव है
वे अपने बच्चों से
