
सितंबर, 2023
मैं कहानीवाला हूँ। मैंने आज सोच लिया हिंदी एक किरदार है और अपनी किरदार से मिलने चला आया। देखिये, हिंदी मुझसे क्या बात कर रही है। भारतीय होने के नाते हमारे जीवन में एक किरदार तो हिंदी भी है। पता नहीं क्यूं, ये किरदार अब कुछ सहमा-सहमा सा रहता है। मैं इस किरदार को इसके हिस्से का अस्तित्व दिलाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि हिंदी छुप कर न रहे, खुलकर सफ़्हे पर आये, हाशिये पर छूट न जाए। हिंदी दिवस की शुभकामनाओं के साथ, मेरी कविता ….
किसी के चरण स्पर्श करने का मन करा
मैंने किताबों की अलमारी जो खोली
हिंदी की महक आयी और मैं खो गया
वो बचपन के गलियारे की यादें
हमें हिंदी बोलना सिखाया नहीं गया
बस आ ही गयी क्यूंकि हिंदी गूंजती थी
हिंदी की समझ तो वैसे ही आयी थी
जैसे हवा के साथ किसी फूल की महक
कस्बे का वो छोटा सा नया स्कूल था
अपनी टीचर को बहन जी बुलाना
नमस्ते करना, हिंदी में प्रार्थना करना।
फिर छठी कक्षा में अंग्रेज़ी आयी थी
कुछ विदेशी सी लगती थी फिर भी
लाट साहब के कायदे सी लगती थी
अंग्रेज़ों की तरह ही हम पर हावी थी
अंग्रेजी का एक अलग सा नशा हो गया
हिंदी किसी दूसरे किनारे पर चली गयी
उसका भी स्वाभिमान था
उसे उपेक्षा स्वीकार न थी।
आज जो हिंदी से मिलने गया उसने कहा
तुम्हारे माता-पिता तो रोज़ मिलते हैं मुझसे
शायद मैं उनकी जीभ पर चिपक गयी हूँ।
तुम भूले से कैसे मुझ तक आ गये
बताओ कहीं कुछ खो गया है क्या?
आत्म ग्लानि थी मैं आँखें मिला न सका
मेरी आँखों से कुछ बूदें गिर पड़ीं और
नदी की लहरें अपने साथ बहा ले गयीं
सोचने लगा कितना कमज़ोर हो गया हूँ
उससे दूर हो कर मुझमें साहस ही नहीं
कि मैं उसे बता दूं, आज हिंदी दिवस है।
मुझे चुप देख वो बोल उठी
याद तो तुम्हें करना है, मुझे तो याद है
आज भी मैं रोज़ की तरह जल्दी उठी थी
जल्दी सब काम निपटा कर
तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी
मुझे मालूम था आज तुम ज़रूर आओगे
आज हिंदी दिवस है न?
हाँ, आज हिंदी दिवस ही तो है
मैंने कहा अब मैं मिलता रहूँगा
मैंने उसके चरण स्पर्श भी किये
अगले साल फिर आने का वादा किया
हिंदी फिर हाशिये पर लौट गयी
मैं भी वापस लौट कर आ गया
सुहास भटनागर@ज़हन के हाशिए पर
