दिसंबर, 2022

गुरुग्राम, हरियाणा
स्वाति स्तब्ध है और धीरे-धीरे सोच विचार में डूबी कपूर आँटी की सीढ़ियाँ उतर रही है। ”सत्तर वर्ष की आयु में कोई औरत कैसे??….”
उसे याद आ रहा है कि, सब्जियों एवं फलों से भरे थैले के साथ हाँफती हुई, पसीने से लथपथ इन आँटी को देख, सहानुभूतिवश थैला उठा उन्हें घर तक छोड़ने आ गयी थी। एक सुसज्जित पेड़-पौधों से सजे घर में उन्हें अकेला देख पूछ ही बैठी ”ऑटी और आपके घर में कौन-कौन है।” “मेरे घर में?” नीबू पानी का गिलास उसकी ओर बढ़ाते हुए ऑटी ने दोहराया ”बस मैं.. और मैं” कहकर वह हँस दी। “आप और अकेली? इस उम्र में क्यों?” उसकी उत्सुकता बढ़ती ही जा रही थी। “एक बेटा था सेना में, वह देश पर बलिदान हो गया और उसके गम में पाँच वर्ष पहले तुम्हारे अंकल चल बसे।” बड़े ही शांत भाव से उन्होंने उत्तर दिया मानो नियति के कठोर निर्णय को स्वीकार कर लिया हो।
”आपको अकेले डर नहीं लगता?” स्वाति ने जिज्ञासावश पूछा “डर किस बात का?” मेरे साथ है न, मेरे साथी ‘हाई ब्लडप्रेशर,’ शुगर और अब एक और नया साथी आ गया है ये मोतिया बिन्द” ऑटी ने हँसते हुए कहा तो आश्चर्यचकित स्वाति उनकी ओर देखती रह गयी।
“ऑटी आप बोर नहीं होती कभी?” स्वाति उनके विषय में सब कुछ एक ही दिन में जानना चाहती थी। “बोर?” “अरे बेटा मुझे तो चौबीस घंटे भी कम पड़ते है। सुबह-शाम की सैर, थोड़ी कसरत, पेड़ पौधों की देखभाल, पूजा-पाठ, चम्पा के तीनों बच्चों का पढ़ाना, मेरी ऑनलाइन किचन गार्डन और स्मार्ट फोन की क्लासेज़। अब देखो न गाड़ी साफ करने वाले का बैंक एकाऊंट खुलवाने जाना है, समय ही नही मिला” ”और….और…. ऑटी कभी ज्यादा तबीयत खराब हो तो? तब पास पड़ोस से कोई भी ‘ओला’ बुक कर देते है, जरूरत पड़ने पर चम्पा भी साथ चल पड़ती है। अब इलाज तो डॉक्टर ने ही करना है बेटा। उन्होंने घुटने पर हाथ रखकर उत्तर दिया। “हाँ एक सर्जरी हुई थी तो बहन को मुम्बई से बुला लिया था। बस कट रही है मज़े में, प्रभु कृपा से।” आँटी फिर हँस दी।
“और तुम सुनाओ बेटा?” “आँटी देर हो रही है फिर कभी बताऊँगी अपनी कहानी” कह स्वाति सीढ़ियाँ उतरने लगी। “वह सोच रही थी इस उम्र में भी ऑटी कितनी जिंदादिली से शेष जीवन बिता रही हैं, और एक मैं हूँ, उनसे आधी उम्र की जीवन में कितनी निराश-हताश हो चुकी हूँ।
दो वर्षों पहले कार एक्सीडेन्ट में पति को अचानक खो देने के बाद उस हादसे से उबर ही नहीं पा रही हूँ। निकुंज नहीं रहे लेकिन उनकी निशानी ‘अर्जुन’ तो मेरे साथ है। जो हो चुका है उसे मैं बदल तो नहीं सकती लेकिन अपनी सोच को तो….अब वह केवल ऑफिस से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर नहीं रहेगी। आगे पढ़ाई कर अपने पैरों पर खड़ी होगी। कार ड्राईविंग, कम्पयूटर सीखते हुए स्वयं को बहुमुखी प्रतिभावान बनायेगी। बस ….अब उसे केवल भविष्य के विषय में सोचना है अर्जुन का भविष्य संवारना है। घर की ओर बढ़ते हुए उसके कदमों में अब तेज़ी आ चुकी थी और वह मन ही मन ऑटी को अनेक धन्यवाद दे रही थी।
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