दिसंबर, 2022

हैदराबाद, तेलंगाना
बुढ़ापे को जवानी का, सहारा मिलना मुश्किल है
चलो ऐसा करो बचपन में, अपने लौट चलते हैं
यकींनन कहने सुनने में, तो ये अच्छा नहीं लगता
मगर सच है यही घर में बुज़ुर्ग, ऐसे ही पलते हैं
नहीं चाहत हमारी हैं, मिले पकवान हमको पर
मिले इज़्ज़त से गर रोटी, तो हम भी उठ के चलते हैं
सुबह से शाम तक बस शोर, सुन के कान हैं बहरे
कहो बच्चों को गर तो, आँख में हम उनकी खलते हैं
कि बचपन से जवानी तक, लगे माँ सबको ही प्यारी
मगर फिर भी न जाने क्यूँ, वो रंग बीवी में ढ़लते हैं
नहीं ऐसा भी कि बच्चे, सभी ऐसे ही होते हैं
मगर किस्मत के मारे, हम देख, उनको खूब जलते हैं
हमारी पेंशन भी, अब हमारी दुश्मन-ए- जानां
निकलती बारहा लेकिन, नहीं कुछ उसमें डलते हैं
जलाया खून जिनकी खातिर हमने, घूप में ऐ ‘दीप’
किसे मालूम था बच्चे कि, ऐसे भी निकलते हैं।
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