सितंबर, 2023

भूख से व्याकुल कुत्ता बोला अपनी कुतिया से
चलो प्रिया ढूंढे कहीं दूजा बसेरा
भूख के मारे छा रहा
आंखों के आगे अंधेरा॥
जो बुढ़िया दादी सबको देती थी आहार
वो आज खुद खाने को है लाचार॥
सुंदर पकवानों से सजती थी थाली
एक-एक कौर से भर जाती थी प्याली॥
तभी बिल्ली बोली सुनो कुत्ता भाई
कहां जाएंगे कैसे रहेंगे
हमारा कौन उपाई॥
प्याली भर दूध देने वाली आज
एक कप चाय को तरसती है
वो कई कई रात भूखे पेट सोती है॥
चूहा बोला मेरा भी है यही हाल
कई दिनों से भूखे हैं मेरे लाल॥
खेती पथारी कुछ नहीं होता
सूना है खेत खलिहान
दाना का कहीं ना नामो निशान॥
पहले के बर्तन धुलते थे अंइठार
गिरे रोटी चावल से मिलता था आहार॥
अब तो सींक में सब घुस जाते हैं
हम भूखे ही रह जाते हैं॥
कांव-कांव करता कौवा आया
कुचर-कुचर कर कष्ट सुनाया॥
पहले घर आंगन सूखते थे अनाज
झट झपटकर चुगते थे अनाज॥
बच्चों के हाथों खाते थे खूब मिठाई
अब तो बंद कमरे में ही खाते सभी भाई॥
प्यास के मारे तड़प रहा हूं
मिला ना एक बूंद जल
उड़-उड़ कर थक चुका हूं
नभ, थल, स्थल॥
किसी का ध्यान नहीं करते ये मानव
स्वयं स्वार्थ में लिप्त बन रहे हैं दानव॥
मैं ना रहूं क्या होगा धरती पर
कीड़े मकोड़े बढ़ जाएंगे परती पर॥
आंगन में खड़ा बूढ़ा नीम का पेड़
टहनी हिले पत्ते फड़फड़ाए
बोला कुछ सहेज॥
मैं तो कुछ नहीं मांगता निज के लिए
सर्वदा जिया हूं परहित के लिए॥
बुढ़िया दादी की तरह दिया हूं वायु प्राण
कलेजा फटता है देख दादी का अपमान॥
अपने ही स्वार्थ के जाल में
दिखावे की चाल में॥
कर रहे हैं प्रकृति का सत्यानाश
अज्ञानता की नशा में
कर रहे हैं स्वयं का विनाश॥
तुम सभी चले जाओगे
दूसरे जगह घर बसाओगे॥
मैं कहीं नहीं जाऊंगा
पत्तों से उन्हें सहलाऊंगा॥
प्राण वायु पिलाऊंगा॥
उनके मरने के बाद भी मैं यहीं रहूंगा
इनकी त्याग तपस्या की गाथा कहूंगा॥
मुझे यकीन है मरने के बाद भी
बुढ़िया दादी की आत्मा यहां आएगी
मकान बीच जब पुराना घर नहीं पाएगी॥
मैं ही बनूंगा इनका पहचान
दूंगा शाखा पर स्थान॥
जब उनके बच्चे आएंगे
झूठा शोक मनाएंगे॥
श्राद्ध पर दावत खिलाएंगे॥
तब मैं कहूंगा बंद कर झूठी दिखावा
मत बुन झूठी छलावा॥
काश खिलाए होते जीवित मां को
नहीं जाती उनकी जान
ना बेकल होता प्राण॥
कैसे तू भूल गया
निज सपनों में ही झूल गया
तुझे पढ़ाने को रात जग दीप जलाती थी
स्वयं भूखी रह तुझे भरपेट खिलाती थी॥
ऊपर उड़ते-उड़ते इतना ना उड़ जाओ कि
अपनों का डोर कट जाए
जीवन अध्याय से अपने ही हट जाए॥
मानव में मानवता ही है पहचान
दया धर्म से ही होता जीव कल्याण॥
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