दिसंबर, 2023
व्याकुल होकर तड़प रही हैं
वृद्ध हुई अब मेरी नानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,

शिक्षक एवं साहित्यकार
संगरिया, हनुमानगढ़ (राजस्थान)
इस जीवन की यही कहानी।।
उम्र शतक के निकट हुई है
हाथों में कंपन रहता है।
अधिक झुर्रियों वाला मुखड़ा,
जीवन का दुखड़ा कहता है।।
खाना-पीना छूट गया सब,
लगती दुनिया सब बेगानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,
इस जीवन की यही कहानी।।
मिलने वाले सब अपनों को,
मुश्किल से पहचान रही हैं।
नन्हे बच्चे-सा मन उनका,
बात नहीं वे मान रही हैं।।
शिथिल-शिथिल सब अंग हुए अब,
जिद जगने की निशि-दिन ठानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,
इस जीवन की यही कहानी।।
बच्चों की गोदी में ख़ुद है,
सबको गोद उठाने वाली।
बरगद-सी छाया अब ढलती,
नहीं रही मुख पर वह लाली।।
औरों से ही चखे निवाला,
बार-बार वे पीती पानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,
इस जीवन की यही कहानी।।
सबके सिर पर जो रहते वे
हाथ हुए हैं रूखे-सूखे।
चमड़ी ज्यादा लटक गई है,
लगता ज्यों बरसों से भूखे।।
न्यून तेल का दीपक लगतीं,
कहाँ गया सब कुछ नूरानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,
इस जीवन की यही कहानी।।
नानी हैं तो हम बच्चे हैं,
नानी से ननिहाल सुहाना।
मीठी-मीठी यादों वाला,
बचपन ला दो वही पुराना।।
हम भी ऐसे हो जाएंगे,
नहीं बचा कोई अभिमानी।
ये दिन सब के ही आने हैं,
इस जीवन की यही कहानी।।
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