मार्च, 2024

भोर भई तो सब मुस्काएं
साँझ हुई तो क्यों घबराएं
जो कुछ पाया कर दे अर्पण
राम नाम ही सच्चा समर्पण
दीन दुखी की सेवा कर ले
जीते जी हो जायेगा तर्पण
जिस द्वारे पर तमस घना हो
उस पर दीप जलाएं
भोर भई तो सब मुस्काएं
सांझ हुई तो क्यों घबराएं
पलक खड़े हैं सपन अधूरे
कैसे होंगे ये सब पूरे
इस खेले का एक मदारी
हम सब उसके हैं जमूरे
नव ऊर्जा से मन को भर ले
आगे कदम बढ़ाएं
भोर भई तो सब मुस्काएं
सांझ हुई तो क्यों घबराएं
सब जाना पर कुछ न जाना
अब तक खुद को न पहचाना
झूठे महल, अटारी, बंगले
छोड़ के एक दिन सब है जाना
आओ जी लें हर एक पल हम
पंक्षी जैसे नाचें- गाएं
भोर भई तो सब मुस्काएं
साँझ हुई तो क्यों घबराएं
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