मार्च, 2024
शारदा की वीणा की बहती तरंग में
बोल है उसके जो गूंजे उमंग में।

विवेकानंदपुरी, दिल्ली
पीत रंग धरे इस तरह बदन पे
हरियाली छा रही हो जैसे पर्वत पे
करे श्रृंगार यूं नव पुष्पों से
मानो मंजरियां बिखर रही हो तन पे।
मंद मंद पवन की सुगंध में
झूम रही वह पुष्प वन में
मिलकर फिर इस तरह वसंत से
रंग रही जैसे पीले रंग में।
करते भ्रमर यूं कमल कली में
रचती संगीत यूं मिलन गली में
शीतकाल के फिर अंत में
गाती गीत यूं वसंत मिलन के।
कोयल जैसे मीठे स्वर में
प्यार घोले वो हर दिल में
कल कल बहता जब नदी का राग
झनकार झलकती फिर जीवन में।
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