हे गणनायक,

सूंड से अज्ञान की गाँठ खोलो,
एकदंत से सत्य का बोध कराओ,
बड़े कानों से मेरे मौन को सुनो,
और इस चंचल मन को
अपने चरणों में स्थिर कर दो।
विघ्न मत हरना—
बस इतनी दृष्टि देना
कि हर विघ्न में छिपा मार्ग दिखाई दे,
हर ठोकर में
जीवन का कोई सत्य समझ आए।
मेरे भीतर विराजो,
विचारों को विवेक दो,
वाणी को सत्य दो,
और मेरी लेखनी को
संवेदनाओं की राह दिखाते रहो।
जब मन डगमगाए,
तुम मेरा विश्वास बन जाना;
जब राह धुँधली हो,
तुम मेरी दृष्टि बन जाना।
विघ्नों से मुक्त जीवन नहीं माँगती,
विघ्नों को समझने की बुद्धि माँगती हूँ।
॥ श्री गणेशाय नमः ॥
