ढ़लती साँझ की व्यथा

दिसंबर, 2025

rashmi jha
रश्मि झा
जोधपुर, राजस्थान
सचिव, मैथिली महिला मंच, जयपुर

कभी धूप कभी छाँव से भरी जीवन की सुनहरी भोर
कब साँझ में ढल गई
काया हो चली शीथिल केश हुए श्वेत
कब अनुभवों की पोटली झुर्रियों में सिमट गई
पता ही नहीं चला।
कुछ सुकून के पल चुराए थे जिंदगी से
समय की धारा में सबकुछ बह गया
समय की रफ्तार ने सबको व्यस्त कर दिया
कब मौन हो गया प्रिय, जीने लगे बगैर संवाद
पता ही नहीं चला।
गूंजती थी किलकारियाँ जहाँ
माथे को चूम कर वो विदा करती
वो देहरी है अभी भी वहाँ
आज… उसी देहरी पर बैठा हूँ
कब घर में सूनापन बसने लगा
उस चहकने वाले कोने में बैठा यह बूढ़ा
कब दीवारों से बातें करने लगा
पता ही नहीं चला।
बीत गई एक उम्र औलादों की चाहत पूरी करने में
फिर गर्व से सीना फूल गया बच्चों के आगे बढ़ने में
अब याद आता हैं वो दिन जब घर भरा सा लगता था
हर कोने में शोर गुल और प्यार बरसता रहता था
कब इस घर में खामोशी का राज हुआ और सन्नाटा पसर गया
कब जीवन की संध्या में मन थोड़ा सा सहम गया
पता ही नहीं चला।
अब चाहत तो बस इतनी है दो मीठे से बोल मिले
कुछ अपनों का संग मिले कुछ दूर तक अपने संग चले
कब खिड़की से चाँद को निहारता ये मन बावरा
काँपते हाथो से थामे चाय का प्याला
कब दवाओ की पर्ची बन गई ज़िन्दगी
पता ही नहीं चला।

फिर भी…. शिकवा नहीं है रब से
क्योंकि यही है दस्तूरे ज़िन्दगी
फूल तो मुरझाएँगे और शमा को भी है बुझनी
लौ को भी तभी तक घी की ज़रूरत जबतक वो जलती
तो बस…जब तक सांस चले अपनों का साथ बना रहे।
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