संतप्त उजाला

जून, 2026

दर्शन सिंह
दर्शन सिंह
श्री कृष्णा नगर कॉलोनी
पोस्ट: मौलाली
हैदराबाद, तेलंगाना

सुभाषिनी ज्यादा पढ़ी लिखी तो नहीं थी लेकिन घरेलू कार्यों में निपुण थी और चर्चित परिवार का साया मिला हुआ था। जवानी की दहलीज पर कदम रखते हैदराबाद के संभ्रांत परिवार में शादी कर दी जाती है। पूजा अर्चना का माहौल था। साधु संतों का आना जाना लगा रहता था। कथा कीर्तन, दीवान का आयोजन होते रहता था। खाने पीने, रहने, सभी सुख सुविधाओं की जिम्मेदारी सुभाषिनी ने अपने कंधों पर ले रखी थी। काफ़ी लोकप्रियता हासिल कर चुकी थी। चूँकि सुभाषिनी नित्य सुबह तीन बजे उठ जाती थी। एक घंटा नाम सिमरन, तत्पश्चात छः बजे तक पूजा पाठ करती थी। एक बेटा व तीन बेटियाँ थी। उन्हें भी इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने के लिए कहा जाता था। बहू आई। उसे भी इसका पालन करने के लिए निर्दिष्ट किया किया गया था। पोते हुए, उन्हें भी इसका पाठ पढ़ाया गया था। बेटियों की शादियाँ हो जाती है। अगर दामाद आए तो इसी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है।
एक बार दामाद विजय को बड़ी नजदीकी से अपनी सास सुभाषिनी को अध्ययन करने का मौका मिलता है। पूजा पाठ का निर्वहन तो ठीक से हो रहा होता है लेकिन स्तब्ध इस बात से था कि जैसे ही सुभाषिनी की अपनी पूजा पाठ की समाप्ति की अरदास छः बजे खत्म होती थी, पति से टकराहट बेवजह शुरू हो जाती थी जो पति के दुकान के लिए नौ बजे रवाना होने तक जारी रहती थी। फ़िर दोबारा दुकान से आने बाद से रात्रि (दस बजे) तक जारी रहती थी।
नित्य पति की आँखों में आँसू भर देती थी। पति को इस टकराहट की समाप्ति के लिए नित्य हाथ जोड़कर माफ़ी माँगनी पड़ती थी। एक दिन सदा के लिए अलविदा हो जाता है। मुंडेरों पर सज्जित था तो सिर्फ़ “संतप्त उजाला”।
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