जून, 2026

व्याख्याता (अंग्रेजी)
घोटिया-बालोद (छत्तीसगढ़)
मनोहर पगार लेकर साइकिल से घर लौट रहा था। बहुत खुश था। मन में बहुत सी बातें चल रही थी। अचानक उसे एक आवाज सुनाई दी- “अरे रुक।”
“ओ…हो…! किसका चेहरा दिख गया आज। फिर ट्रैफिक पुलिस ! ऊँ…हूँ…!” मनोहर को रुकना ही पड़ा।
“अबे! मेरो को दौड़ा दिया रे। तेरे कारण हाँफ डाला। मेरी धड़कन बढ़ गयी।” एक रौबदार आवाज निकली।
“गलती हो गयी सहाब। मैं थोड़ी जल्दी में हूँ।”
“पहले तू निकाल। आज शनिच्चर है; आज तुझे जरूर मालपानी मिला होगा।”
“नहीं सहाब…!”
“हमसे झूठ बोलता है बे। दुनिया को बेवकूफ बनाना; हमें नहीं। यहाँ घंटा भर से खड़ा हूँ। समझा?”
“ठीक है सहाब! बहुत मेहनत करना पड़ता है सहाब। इत्ता ही दे सकता हूँ सहाब। ले लो।”
“अबे… अबे…! क्या यहाँ हम झक मारने खड़े हैं? हम भी तो मेहनत करते हैं। पसीना निकल जाता है खड़ा खड़ा। यहाँ जगह-जगह सीसीटीवी कैमरा लगा है। देखता नहीं? तू एक काम कर, चुपचाप वहाँ जा। वो बाइक खड़ी है। डिग्गी में जा डाल मालपानी हिसाब से। समझा? और तुरंत दफा हो यहाँ से।”
एक घंटे बाद ट्रैफिक वाला अपनी बाइक के पास आया। “हद हो गया रे! सा..ला…! सौ ही डाला है। तेरीत् तो…! वा… पचास बस! अरे एक सिक्का भी! साला… हम ट्रैफिक पुलिस वाला को औघड़ दानी भगवान भोला बाबा समझ गया। एक सौ इन्कावन बस…!”
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