जून, 2026

लखनऊ, उत्तर प्रदेश
(लेखिका परिचय: अनेक स्वतंत्र लेखन के अतिरिक्त 10 कहानी संग्रह, एक आत्मकथा, 4 उपन्यास, और 4 कविता संग्रह कहानी संग्रह- 1- बियाबानों के जंगल, 2. धूप भरे दिन, 3. मुट्ठी भर इच्छाएँ, 4. लड़कियाँ डरती नही हैं, 5. माटी में उगते शब्द (ग्रामीण परिवेश की कहानियाँ), 6. जी हाँ, मैं लेखिका हूँ, 7. अमलतास के फूल, 8. पत्तों पर ठहरी ओस की बूँदें (प्रेम कहानियाँ), 9. ….और एक दिन, 10. मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ, आत्मकथा- पथरीली पगडंडियों का सफर; उपन्यास – (1) मेरे शहर का मौसम (2) अपने-अपने इन्द्रधनुष (3) उन्हीं रास्तों से गुज़रते हुए, और (4) ललई भाई (एक राजनैतिक गाथा); कविता संग्रह – (1) मेघ, मानसून और मन, (2) ढूँढ कर लाओं ज़िन्दगी (3) बारिश और भूमि (4) स्वप्न। अनेक सम्मानों से सम्मानित)
कमरे की खिड़की बन्द थी। इस कमरे में एक ही खिड़की थी वो भी बन्द थी। मुझे थोड़ी घुटन-सी महसूस हुई। उठ कर मैंने खिड़की खोल दी। कदाचित् बाहर ठंड थी। पूरा कमरा ठंडी हवा से भर गया। मैंने खिड़की का पर्दा बन्द कर दिया। कमरे में ठंडी हवा का प्रभाव कुछ कम हो गया।
अभी सप्ताह-दो सप्ताह पूर्व मौसम कितना सुहाना था। देखते-देखते मौसम ने कब शीतल हवाओं का साथ अपना लिया पता नही चला।
मैंने सामने दीवार में टँगी घड़ी में समय देखा। नौ बजने वाले हैं। सुमन (काम वाली) के आने का समय हो गया। साढ़े नौ बजे तक सुमन काम पर आ जाएगी। मैं शीघ्र बााथरूम में चली गयी ताकि उसके आने से पूर्व फ्रैश होकर बाहर आ जाऊँ और सुमन के साथ घर के काम करवा सकूँ।
वैसे तो सुमन सभी तय काम स्वतः कर लेती है। सुमन से जो नया कुछ बताना कभी मैं विस्मृत कर जाती हूँ तो वो काम रह जाता है और मुझे ही करना पड़ता है।
मैं नहा कर आ गयी। सुमन के आने में अभी समय था। अतः मैं अपने लिए एक प्याला चाय बनाकर ले आयी। बिना शक्कर की चाय बनानी थी। फटाफट बन गयी। चाय लकर मैं बहर के कमरे में आ गयी। घर के अन्दर के हिस्से में एक छोटी-सी रसोई, बरामदा और दूसरी ओर बाथरूम और एक छोटा-सा एक अन्य कमरा है।
बस, इसी छोटे से घर का बाहरी कक्ष मेरा शयन कक्ष और ड्राइंगरूम सब है। इसी कक्ष में बैठ कर मैं चाय पीने लगी। कुछ ही देर पश्चात् सरोज आ जाएगी। मैं सरोज की प्रतीक्षा करने लगी। खिड़की से छनकर धूप कमरे आने लगी। कदाचित् बाहर धूप खुल कर निकल आयी थी। मैंने खिड़की का परदा हटा दिया।
थोड़ी धूप खिड़की से अन्दर आकर मेज से होती हुई फर्श पर पसर गयी। कितनी चमकीली, अच्छी, सुनहरी धूप थी। इच्छा हो रही थी कि बाहों में भर कर अपने अस्तित्व में विलीन कर लूँ। किन्तु यह कहाँ सम्भव था।
डोरबेल बज गयी। साथ में सुमन की आवाज भी….आण्टी।
“आयी बेटा।’’ कहते हुए मैं स्वयं को सम्हालते हुए दरवाजे की ओर बढ़ी। ये सुमन भी न! दोनों आप्शन यूज करती है…..डोरबेल बजाती है और आवाज भी लगाती है। सुमन के इस स्वभाव के बारे में सोचकर मैं मुस्करा पड़ी।
“ कैसी हैं आण्टी?’’ दरवाजा खोलते ही प्रतिदिन की भाँति सुमन ने पूछा।
“ठीक हूँ।’’ कहते हुए मैंने दरवाजा अन्दर से बन्द किया और सुमन के साथ रसोई में आ गयी।
सुमन रसोई में काम करने लगी। मैं फ्रीज से सब्जियाँ और दूध निकालने लगी। ताकि सुमन सब्जी काट कर बना दे और दूध उबाल दे।
“आण्टी आप बैठ जाइए। मैं सब कुछ फ्रीज से लूँगी। अभी से थकने लगेंगीं। शाम का थोड़ा-बहुत काम रहता है। वो तो आप कर ही रही हैं। अब इस समय मैं सब कर दूँगी। आप आराम कीजिए।’’ सुमन ने कहा।
“हाँ बेटा। मैं कुछ नही कर रही हूँ। फ्रीज में देखना भी आवश्यक है कि कल के लिए सब्जी है कि नही।’’ मैंने कहा।
“ठीक है आण्टी। मैं कभी-कभी जब आप कहती हैं तो एकाध सब्जी ले कर आती ही हूँ। अब प्रतिदिन दो सब्जी ले कर आऊँगी। आपको दरवाजे से ज्यादा सब्जियाँ लेकर रखने की आवश्यकता नही है। कई बार कुछ सब्जियाँ खराब हो जाती हैं। दूध भी बता देंगी तो मैं लेती आऊँगी।’’ सुमन ने कहा।
सुमन ने कहा तो मैं वहीं रसोई के सामने छोटे बरामदे में कुर्सी डालकर बैठ गयी। मुझे सुमन भी काम करते दिख रही थी। कुछ पूछना पड़ता तो में बैठे-बैठे वहीं से बता देती।
छोटे-से बरामदे में बैठे-बैठे प्रतिदिन सुमन से सब्जी-पराठे बनवाते-बनवाते जीवन का एक-एक दिन ऐसे बीतता जा रहा है जैसे दिन नही, जीवन से खुशियाँ कम होती जा रही हैं। अब तो महीने की पहली तारिख को पति के पेंशन की प्रतीक्षा करती हूँ। पेंशन आ जाने पर महीने का सामान लेने में व्यस्त हो जाती हँू। उसके पश्चात् सारी व्यस्तता, सारा काम खत्म।
पूरा महीना ही नही, पूरा जीवन जैसे रिक्त।
“आण्टी बर्तन घुल गये। रसोई की साफ-सफाई हो गयी। अब भोजन बना दूँ। बताइए क्या बना दूँ? कुछ अच्छा-सा बता दीजिए जिसमें स्वाद आये आपको।’’ सुमन ने रसोई से पूछा।
“पहले तो नाश्ते के लिए नमकीन दलिया बना दो। दलिया थोड़ी बढ़ा कर बना देना, शाम को भी खा लूँगी।’’ मैंने सुमन से कहा।
“और भोजन?’’ सुमन ने पूछा।
“मैं बता-बता कर ऊब चुकी हूँ। जो तुम्हें समझ में आये, तुम्हें लगे कि आण्टी को ये थोड़ा ठीक लगेगा, वही बना दो।” मैंने सुमन से कहा।
“ठीक है आण्टी। मैं आलू और प्याज के पराठे बना दूँगीं। इन्हें आप दही से खा लीजिएगा। इधर लगातार दाल-चावल बना है। ठीक है आण्टी?’’ सुमन ने पूछा।
“हाँ….हाँ..। कहा तो भोजन में अब जो तुम्हारा मन हो वो बना दिया करो।’’ मैंने सुमन से कहा।
सुमन ने भोजन बना कर रसोई का काम समेटा और झाड़ू-पोंछा कर के जाने लगी।’’ आण्टी सब काम हो गया है। शाम को कोई काम हो तो फोन कर दिया कीजिए। मैं आ जाऊँगी। परेशान न हुआ कीजिए। बाज़ार चलना हो, कोई सामान लेने जाना हो तो मुझे बता दिया कीजिए। मैं साथ में चली चलूँगी।’’ सुमन ने कहा।
सुमन की बातें सुनकर मेरे भीतर पीड़ा भरी भावनाओं का ज्वार उमड़ पड़ा। ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे रो पड़ूँगी। किन्तु सुमन के सामने मुझे ये सब नही करना था। सुमन चली गयी। मैंने दरवाजा बन्द कर लिया।
सुमन के जाते ही मैं सोचने लगी कि सुमन कितनी भली है। दो वर्ष से मेरे घर काम कर रही है। तय काम के अतिरिक्त दूध गरम कर देना। छोटे-मोटे रसोई के सामान ला देना। किसी भी समय मेरे घर के काम के लिए तत्पर रहना। कितनी खूबियाँ हैं सुमन में। कदाचित् वो मेरी उम्र की विवशताएँ समझती है।
समय आगे बढ़ता जा रहा है। समय का तो काम ही है आगे बढ़ना। समय चक्र के साथ ऋतुओं का परिवर्तन भी होता जा रहा है। सब कुछ चलायमान है। शाम होती है, दूसरे दिन का सवेरा होता है। किन्तु मेरा जीवन तो जैसे मेरे पति के जाने के बाद वहीं ठहर गया है।
जब वो थे तब उन्हें पेशन मिलने लगी थी। सेवानिवृत्त जो हो गये थे। हमारा एकलौता पुत्र जो उस समय हमारे पास रहा करता था वो उस समय नौकरी की तैयारी कर रहा था। काम ढूँढ रहा था।
पेंशन मिलते ही मेरे पति बैंक से पैसे लाते और बैठ कर घर के खर्चों का हिसाब लगाते। उन खर्चों को वे किसी पेपर पर लिख लेते। पैसों को इस प्रकार व्यवस्थित करते कि पूरे महीने का खर्च आराम से चल जाये। उन्हीं से ये सब सीखा है।
जब वे नौकरी में थे उसी समय ये घर उन्होंने लिया था। आवश्यकता और बजट के हिसाब से ठीक था। सिर्फ मुझे रहना है तो अब भी ठीक है। बेटे की नौकरी में लग जाने की उनकी बहुत इच्छा थी। हमेशा पूछा करते कि कौन-कौन से फार्म भरे?
किसका परिणाम कब निकलेगा?
इतना ही नही वह उससे ये भी कहते कि फार्म भरने के लिए जितने पैसों की आवश्यकता हो माँग लेना और भी कोई आवश्यकता हो तो निःसंकेाच पैसे माँग लेना। बेटा बाहर से आता तो सीधे मेरे पास आता। कदाचित् पिता की प्रश्नवाचक दृष्टि का सामना वो नही कर पाता होगा।
पिता की उम्मीदें बेटे से इतनी बँधी थीं कि जब वो इधर-उधर जाता तो मुझसे धीरे से पूछते कि बेटे ने कुछ बताया क्या?
उनका मतलब उसकी नौकरी से रहता था।
वो अलग धीमें से मुझसे बेटे की नौकरी के बारे में इसलिए पूछते ताकि बेटे का पता न चले और मैं उनसे कहती कुछ होगा तो बेटा स्वयं बताएगा। मेरे पति मेरी बात का समर्थन करते हुए कह पड़ते कि हाँ, तुम ठीक ही कह रही हो। जब कोई खुशी की बात होगी तो वो छुपेगी थोड़ी।
मैं बेटे के अकेले होने पर कभी-कभी उसकी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखती?
“कर रहा हूँ मम्मा। हो जाएगा।’’ वो बस इतना ही कहता।
बेटा प्रयत्न करता रहा और एक दिन न जाने क्या हुआ कि बेटे के पिता हम सब से रूठ कर वहाँ ले गये जहाँ से कोई पुनः लौट कर नही आता। वो बेटे की नौकरी की प्रतीक्षा न कर सके। बेटा रोता रहा… ..पापा आ जाइए। नाराज न होइए। मैंने पूरी कोशिश की है। दिन रात परिश्रम किया है।… आ जाइए पापा… आ जाइए। वो कैसे आ सकते थे?
मात्र चार माह बीते थे कि बेटे की नौकरी का नियुक्ति पत्र आ गया। मात्र चार माह। मेरे पति प्रसन्नता के इस क्षण को देखने से वंचित रह गये। जो भी हो, वो जहाँ भी होंगे, वहाँ से खुश होकर बेटे को आशीर्वाद अवश्य दे रहे होंगे।
बेटे की नौकरी दूसरे शहर में मिली। इतऩी दूर स्थित शहर जहाँ से घर आने में लगभग तीन घंटे से अधिक का समय लगता था। पति को गुजरे छः माह भी न हुए थे…..मैं अकेलेपन से जूझ ही रही थी कि बेटे को नौकरी के लिए दूसरे शहर में जाना पड़ गया। बेटे के न रहने से मेरा अकेलापन और बढ़ गया।
बेटा इतनी दूर से प्रत्येक रविवार कैसे आ जा सकता था? अतः वो दूसरे शनिवार को जब दो दिन की छुट्टी मिलती तब आता था। या किसी पर्व पर जब एक साथ दो दिनों का अवकाश मिले। इस प्रकार बेटा अधिकांशतः महीने में दो बार आ पाता था।
बेटा दो बार आता अवश्य किन्तु उसके आने की प्रतीक्षा बहुत सुकून भरी रहती। उसी सुकून भरी प्रतीक्षा में पूरा माह कट जाता। बेटे को नौकरी करते हुए दो माह हो गये। अब मैं बेटे का विवाह कर देना चाहती थी। नौकरी ढूँढ़ने में ही बेटे की विवाह की उम्र हो गयी थी।
“बेटा मेरे एक रिश्तेदार आये थे। वे तुम्हारे विवाह के लिए कोई लड़की बताना चाह रहे थे। मैंने कह दिया कि बेटे से पूछ कर बताऊँगी।’’ एक वर्ष से अधिक हो गये थे बेटे को नौकरी करते हुए। मैं भी चाहती थी कि एक उत्तरदायित्व और मेरे कंधों पर है, जिसे मैं पूरा कर दूँ तो मेरे मन को कुछ सुकून मिले।
“आप अभी लड़की न देखिए मम्मी। मुझे कुछ समय दीजिए। जब मैं कहूँगा तब मेरे विवाह के लिए लड़कियाँ देखिएगा।’’
बेटे की बात सुनकर मैं शान्त होकर बैठ गयी। जब वो कहेगा तब एकाध रिश्तेदारों को कह दूँगी। अच्छी नौकरी में है तो मनपसन्द, सुशील लड़की मिल ही जाएगी।
छः माह और व्यतीत हो गये। पति की स्मृतियों की पीड़ा पर समय का मरहम लगता जा रहा था। उनकी स्मृतियाँ सदा मेरे साथ बनी रहतीं किन्तु अब वे दुःख नही देती बल्कि जीवन में एक संतुष्टि का एहसास दिलातीं।’’ मम्मी मैं अपने कार्यालय में साथ काम करने वाली एक लड़की से विवाह करना चाहता हूँ। हमारी अगले महीने विवाह करने की इच्छा है। सोचा आपको बता दें।’’ उस दिन मेरा बेटा दूसरे शनिवार के अवकाश में घर आया था।
उसकी बात सुनकर मैं उसका मुँह देखने लगी। उसे मेरा इस प्रकार देखना वो समझ पाया या नही ये मैं नही जानती। उसे अपने काम में व्यस्त होते देख मैंने कहा कि एक महीने में कैसे सारी तैयारी हो पाएगी? मैंने उसके पिता के बैंक एकाउण्ट के व पेंशन के पैसे बचा कर उसके विवाह के लिए रखी थी।
मैंने उन पैसों से धूमधाम से बेटे के विवाह का सपना सँजों कर रखा था। बेटे के विवाह में सारे रिश्तेदारों को बुलाऊँगी। धूमधाम से सारे वैवाहिक रस्मों को निभाऊँगी। जिसके साक्षी मेरे सभी चिर-परिचित होंगे।
“तैयारी क्या करना माँ? हमने तय किया है कि हम कोर्ट मैंरिज कर लेंगे। जो पैसे आपने मेरे विवाह में खर्च करने के लिए रखे हैं वो चाहे तो हमें दे दीजिएगा। मैं किराये के कमरे में रह कर नौकरी कर रहा हूँ। वो पैसे दे देंगी तो कुछ पैसे और मिला कर मैं किस्तों पर दो या तीन कमरों का, जैसा भी बजट होगा एक फ्लैट ले लूँगा। आगे जैसी आपकी इच्छा।’’ कह कर बेटा अपने बार्डरोब में कपड़े आदि ठीक करने लगा। मैं बेटे की बात और उसकी भविष्य की योजना देखकर निःशब्द थी। मैं अकेली… ..उम्र के अन्तिम पड़ाव पर खुशियों के कुछ पल ढूँढ़ रही थी। बेटे से अपनी इच्छा या अपनी बात मनवाने का साहस मुझमें नही था। कारण महज यह था कि बेटा मेरी बात का कहीं बुरा मान कर महीने में दो बार जो घर आता है वो कहीं आना न बन्द कर दे। उसका दो बार आना ही मेरे जीने का सहारा है।
“ठीक है बेटा, जैसा तुम चाहो। जो तुम कहोगे वो मैं कर दूँगी।’’ मैंने बेटे से कहा। बेटे ने मेरे शब्दो में छिपे दर्द को समझा या नहीं वो मैं नहीं जानती।
अगले दिन बेटा नौकरी पर चला गया क्यों कि उसकी दो दिन की छुट्टियाँ खत्म हो गयी थीं। लगभग दो सप्ताह व्यतीत हो गये। इस शनिवार बेटे को आना था। मैं उसके आने की प्रतीक्षा कर रही थी। घर के काम समाप्त कर बैठी ही थी कि फोन की घंटी बज उठी। फोन बेटे का था।
“हलौ, बोलो बेटा? क्या हाल है? कितना समय और लगेगा घर आने में?’’ फोन उठाते ही बेटे की बात सुने बिना मैंने ही प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
“मम्मी, मैंने और सुमेधा ने चार दिन पूर्व विवाह कर लिया है। हमने कोर्ट मैरिज की है। आपको बताया था न! जब अवकाश मिलेगा तो सुमेधा को आपसे मिलवाने ले आऊँगा। एक फ्लैट देख रखा है तो उसके लिए पैसे भी लेने हैं। मम्मी अब फोन रखता हूँ। कुछ काम है।’’ कह कर बेटे ने फोन रख दिया।
बेटे का बातों से प्रतीत हुआ कि वो सचमुच व्यस्त था। नयी-नयी शादी, नौकरी के साथ घर गृहस्थी की व्यस्तता। बेटे के पास समय की थोड़ी कमी होनी ही थी। किन्तु इतनी क्या कि मुझे अपने विवाह में बुलाना तो दूर, समय पर सूचना देना भी आवश्यक नही समझा।
अब किसी प्रकार समय निकाल कर पैसे लेने और बहू को मुझसे मिलवाने लाएगा। बेटे के आने की प्रतीक्षा के वो दिन अत्यन्त उहापोह में बीते। भाँति-भाँति के विचार मन में आते रहे।
कभी ये सोचकर खुश हो जाती कि बेटा मेरा अकेलापन देख कर कुछ माह के लिए ही सही कदाचित् बहू को मेरे पास छोड़कर चला जाएगा। पहले की भाँति दूसरे शनिवार को घर आया करेगा। ये सोच कर मन प्रसन्न होने लगा।
मन में ये भी विचार आ रहा था कि बेटे ने विवाह में नही बुलाया तो क्या हुआ? मैं कोई पराई थोड़े ही हूँ। उन दोनों ने जल्दी-जल्दी में विवाह का कार्यक्रम बनाया होगा। कार्यालय से अवकाश नही मिलता होगा, इसलिए विवाह कर लिया होगा। अब तो बेटा आने के लिए कह रहा है। आखिर अपनी मम्मी को छोड़कर वो कहाँ जा सकता है?… …
इन्हीं विचारों के उधेड़-बुन में मेरे दिन व्यतीत हो रहे थे। एक….दो……तीन….होते-होते छः दिन और सातवें दिन बेटा-बहू के साथ अपने घर के यानि कि मेरे दरवाजे पर खड़ा था। मैं जानती थी कि वो आज आ सकता है अतः घर में थोड़ी तैयारी कर ली थी।
मैंने दरवाजा खोला। बहू के साथ बेटा घर में आ गया। बहू ने ऐसी मुस्कान से मेरी ओर देखा जो फीकी थी। मेरी उम्र हो गयी थी। इतनी समझ थी मुझमें। फिर भी मैंने बहू को गले लगाया और सुखी भविष्य का आशीर्वाद दिया।
मैंने चाय और नाश्ता जो अभी-अभी काम वाली से बनवा कर रखा था। बेटे बहू के आगे रख दिया। बहू जब से आयी थी तब से बेटे के साथ ही बैठी थी। न वो मुझसे बेटी की भाँति बात कर रही थी न मैं उसे माँ की भाँति स्नेह कर पा रही थी। किन्तु मेरे मन में बहू के लिए बेटी-सा स्नेह उमड़ रहा था।
“मम्मी, कल सुबह हम लोगों को जाना है। पैसे आज ही दे देतीं तो ठीक रहता। घर पहुँचते-पहुँचते कल शाम हो ही जाएगी। परसों कार्यालय हमें समय पर पहुँचना है।’’ बेटे की आवाज सुनकर मुझे ऐसा प्रतीत हुआ कि मेरे पति तीन वर्ष पूर्व नहीं बल्कि आज ही परलोक गमन कर गये हैं और मैं इस दुनिया में भटकने के लिए अकेली रह गयी हूँ।
“ठीक है बेटा देखती हूँ। क्या है? कितना है? जब से वो गये है तब से इस ओर ध्यान ही नही दिया।’’ बेटे से मैंने कहा।
“देखा ही नही? तो घर कैसे चलाती हैं?’’ इस बार बहू ने बोला।
बहू की बात सुनकर मैं कुछ बोल न सकी। क्यों कि बहू को पहली बार कुछ बोलते हुए सुना वो भी ऐसा जो मेरे हृदय को छूते हुए तोड़ कर चला गया।
मैं अपने कमरे में गयी। चारपाई पर ऐसे धम्म से लेट गयी जैसे बस चन्द साँसे ही मेरे जीवन की शेष हैं। कुछ देर लेटने के पश्चात् स्वयं को सम्हाला। मुझे मेरे जीवन के शेष बचे हुए दिनों की रूपरेखा स्पष्ट दिखने लगी थी। मेरे मन में कोई संशय या दुविधा नहीं थी।
मैंने अपने पति की परिश्रम से कमाई और मेरे दुःख-सुख के लिए जोड़ी हुई सम्पत्ति को थोड़ा-सा तो सम्हालना ही था। मेरे न रहने पर जो कुछ बचा रहेगा वो बेटा ले ही लेगा। किन्तु अभी से नहीं। न जाने कब, कितनी आवश्यकता मुझे पड़ जाये। इसके लिए मै कहा हाथ फैलाऊँगी। कोई है भी तो नही। मैंने बेटे को पैसों का लगभग चैथाई हिस्सा देते हुए कहा कि बस इतना ही बचा था।
“बस! पापा ने इतने ही पैसे छोड़े थे? पेंशन में से कुछ बचते है?’’ बेटा ने पूछा।
“तुम स्वयं जोड़ लो बेटा। महीने भर का राशन, बजली का बिल और मेरी शुगर की दवाईयाँ, काम वाली के पैसे आदि। कुछ भी नही बचता। महीने का खर्च बहुत किफायत के साथ चलाना पड़ता है।’’ मैंने बेटे से कहा।
“इतने से फिर कैसे काम चलेगा?’’ बेटे ने अपनी पत्नी से कहा।
“बैंक में कुछ भी नही छोड़ा था?’’ बहू ने शंका भरे शब्दों में मेरे बेटे से पूछा। बेटे ने कुछ नही बोला।
“छोड़ा था। उनके उपचार में और अन्तिम संस्कार में पैसे नही लगते क्या? तुम्हारा पति ही लाया था सारे पैसे निकाल कर बैंक से, तब सब कुछ हो पाया था। उस समय तो इसकी नौकरी भी नहीं थी।’’ बेटे को चुप देख मैंने बहू से कहा। मेरी बात सुनकर बहू ड्राइंगरूम में जाकर बैठ गयी। बहू के पीछे बेटा भी चला गया।
“माँ आपके पास गहने तो होंगे?’’ थोड़ी देर में बहू के पास से बेटा आया और मुझसे पूछा।
“ये बताओ बेटा कि तुमने मुझे गहनों की खरीददारी करते हुए कितनी बार देखा है? एक-दो गहने हैं मेरे शरीर पर बस ये ही हैं। तुम्हारे पापा के अधिकांश पैसे घर के खर्चों के अतिरिक्त, तुम्हारी पढ़ाई, इस मकान की किस्त आदि देने में खर्च हो जाते थे। मुझे गहनें पहनने का शौक भी नही था। न तुम्हारे पापा से कभी खरीदने के लिए कहा।… … अब तुम घर ले रहे हो तो स्वयं जान जाओगे कि मकान की किस्त देने के बाद अन्य खर्चे कैसे व्यवस्थित किये जाएंगे।’’ मेरा इतना बड़ा लेक्चर सुनकर बेटा चुप रहा। मेरी आवाज ड्राइंगरूम में भी अवश्य जा रही होगी। अतः बहू ने भी सुना होगा।
मेरे प्रति बेटे-बहू का व्यवहार, उनका ब्याह कर लेना, मुझे बाद में बताना और अब सिर्फ पैसों के लिए आना… … मैं समझ गयी थी कि पूरे पैसे दे दूँ या कुछ अपने भविष्य के लिए भी बचा लूँ। बेटे और बहू द्वारा अब मैं नही पूछी जाऊँगी। बेटा बदल चुका है।
मैंने बेटे से कभी भी उसकी सैलरी नही पूछी। उसके खर्चे नही पूछे। इसके विपरीत जब भी वो नौकरी पर जाता था, आशीर्वाद स्वरूप कुछ पैसे मैं उसे अपने पास से दे देती थी। फिर भी मेरा बेटा न जाने किसकी कमा कर रखी हुई रकम बटोरने आ गया?
अपनी माँ के बारे में उसने कभी नही पूछा कि पापा की छोड़ी हुई थोड़ी पेंशन में मेरा खर्च चल जाता है कि नही? मुझे पैसों की आवश्यकता तो नही है? कोई बात नही। जो बहुत थोड़े से पैसे मैंने अपनी वृद्धावस्था की बीमारियों के लिए बचाकर रखे हैं उन पर ही मेरे जीवन का बचा हुआ शेष हिस्सा निर्भर है।
अगले दिन बेटा चला गया। जाने से पूर्व मैंने बहू का खाँचे (आँचल) भरा… … जिसमें चावल, दूब, हल्दी और कुछ रूपये रखे। मैं बेटे को खुश देखना चाहती थी। खोंचा भरते समय भी बहू के चेहरे पर मुस्कान नही थी। वो ऐसा व्यवहार कर रही थी जैसे पहली बार सास से मिलने आयी हो तो सास के लिए मेरे बेटे से साड़ी, कपड़े खरीदवा कर लाई हो?
मैं जानती हूँ कि युवा उम्र के बच्चों में इतनी दुनियादारी की समझ नही होती है। बच्चे नासमझ होते हैं। किन्तु इन्हीं बच्चों के पास इतनी समझ है कि वे बिना माँ को बताये विवाह कर ले रहे हैं। इस संसार में रिश्तों के नाम पर जीवित इकलौती माँ को समय पर सूचना देना भी आवश्यक नही समझते? ऐसे बच्चों को नासमझ समझूँ या समझदार? मेरे भीतर दुविधा की स्थिति बनी हुई थी।
बेटे के जाने के पश्चात् मैं खूब रोई। थोडे़ से पैसे जो अपने स्वास्थ्य कारणों से बेटे को बिना बताये रख लिया था उसे निकाल कर बेड पर फेंका और मन ही मन बोल पड़ी कि इन्हीं कागज़ के टुकड़ो के लिए मेरा बेटा मुझसे अनेकों प्रश्न कर रहा था।
क्या रिश्ते अब पैसों से मापे जाएँगे? पैसों के बिना माँ-पुत्र के रिश्तों का भी कोई अर्थ नही है? क्या ये वो समय है जब पैसे न खर्च करने पड़ें, इस कारण बच्चे माता-पिता की देखभाल भी नही करेंगे? उन्हें वृद्धाश्रमों में छोड़ कर आ जाएँगे। अथवा वृद्ध माता-पिता घर में अकेले रहने के लिए छोड़ दिये जाएँगे, जैसे मैं रह रही हूँ।
वो मेरा इकलौता बेटा है। मैं उसी के लिए जी रही हूँ। मेरे जीवन में उसके अतिरिक्त और क्या हैं? क्या उद्देश्य है मेरे जीने का, मेरे जीवन का? मैं बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती रहती हूँ।
दो वर्ष हो गये बेटा मुझसे मिलने नही आया। यही उपकार क्या कम है मुझ पर कि प्रति सप्ताह फोन कर मेरा हाल पूछ लेता है। मैं अकेली रहती हूँ। अपनी देखभाल अकेली कर लेती हूँ। किन्तु एक भय सदा मेरे मन में बना रहता है कि कहीं मेरा बेटा फोन करना ही न बन्द कर दे। क्यों कि फोन के रिंगटोन से ही कदचित् मेरी साँसें जुड़ी हैं।
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