जिन्दगी

सितंबर 2026

शान्ति झा

“तूने क्या नहीं दिखाया, ज़िंदगी!
तूने क्या नहीं सिखाया, ज़िंदगी!”
पल-पल गिरना, गिरकर फिर उठना,
उठकर चलना, चलकर सँभलना,


फिर आगे बढ़ना…
जैसे ही आगे बढ़ी, पीछे मुड़ी तो देखा—अपने खड़े थे, आस भरी आँखों से मुझे देखते हुए। मैं रुकी और सबको साथ लेकर चली। सब खुश थे, परिवार हँसते-खेलते गुज़र-बसर कर रहा था।
अचानक फिर एक नई समस्या—
“यह क्या था?”
सब एक साथ हैं, सिवाय मेरे…
क्या सारी ग़लती मेरी थी??
जो मैंने की ही नहीं, उसका नाम मेरे साथ जुड़ गया?
मैं फिर टूट गई, मैं फिर गिर गई।
खुद को समझाया, फिर उठी। चलने की हिम्मत की, धीरे-धीरे चलना शुरू किया…
तभी लगा जैसे कोई मेरा हाथ पकड़कर आगे खींच रहा हो।
“कौन हो आप??”
आवाज़ आई— “ज़िंदगी।”
“मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो। मैं थक गई हूँ, अब मुझसे नहीं चला जाता!”
आवाज़ आई—
“एक मुकाम हासिल करने में, सक्षम बनने में बहुत कुछ झेलना पड़ता है। अपने लिए तो हर कोई जीता है, पर दूसरों के लिए जीना, दूसरों की सहायता करना, सबका हाथ पकड़कर अपने साथ रखना—यही तो सच्ची ज़िंदगी है। इसका आनंद लो, खुद को इस लायक समझो… यही तो ज़िंदगी है!”
मैं फिर उठी और धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।
अब तो आदत सी हो गई है…
ज़िंदगी में शांति है, और शांति में ही ज़िंदगी है!

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