रोज

सितंबर 2026

मोतीलाल दास
मोतीलाल दास
डोंगाकाटा, नंदपुर
मनोहरपुर, झारखंड

धूप
छूना चाहती है
मेरे आँगन को
हर रोज़।

धूप
चूमना चाहती है
आँगन की तुलसी को
हर रोज़।

धूप
बिखेरती है किरणें
पूरी सर्जना के साथ
हर रोज़।

धूप
समेटती है किरणें
बहते आँसुओं के साथ
हर रोज़।

आँगन
चमक उठता है
धूप की किरणों के संग,

और धूप
खेलने लगती है
लुका-छिपी का खेल
हर रोज़।

जब धूप
छुप जाती है
तुलसी के पीछे,
आँगन
नहीं ढूँढ़ पाता है
हर रोज़।

जब माँ
दीया-बाती करती है
तुलसी पर,
आँगन दुबक जाता है
किसी कोने में
हर रोज़।
धीरे-धीरे
रात पसर जाती है
आँगन में,
और मुझे
मेरा आँगन
कहीं नज़र नहीं आता
हर रोज़।

यह भी पढ़ें  वीरत्व की परिभाषा

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top