सितंबर 2026

पर्यटन अपार्टमेंट, वसुंधरा एन्क्लेव, नई दिल्ली
राखी भेज रहा हूँ बहना, तुमको ही इस बार,
रक्षा-वचन निभा देना, तुम पर ही परिवार!
इस बार भी आ न सकूँगा,
कोई भेंट ला न सकूँगा।
घात लगाए बैठा दुश्मन,
सीमा के उस पार;
राखी भेज रहा हूँ बहना,
तुमको ही इस बार।
अपना वादा तोड़ूँ कैसे?
माँ को अकेला छोड़ूँ कैसे?
माँ भारती पर ही टिका है,
हम सबका संसार;
रक्षा-वचन निभा देना,
तुम पर ही परिवार!
मुन्ना रोए समझा देना,
भाभी को भी बतला देना,
निभाना है मातृभूमि का फ़र्ज़,
पति-धर्म निभा न सका,
है हम पर उसका क़र्ज़!
अगले जन्म चुका दूँगा,
हिय में उसको बसा लूँगा;
कर्तव्य-पथ पर डटा हूँ मैं,
निज मातृभूमि की रक्षा का है भार;
राखी भेज रहा हूँ बहना,
तुमको ही इस बार!
पापा से कहना तुम,
एक दिन होगा मुझ पर गर्व;
वही बताए थे मुझको—
देश-हित से बड़ा न पर्व!
धन्यवाद हे जनक!
आपसे ही मिला हमें,
सत्कर्म का संस्कार;
रक्षा-वचन निभा देना,
तुम पर ही परिवार!
भावुक हो जाता हूँ मैं,
लेकर माँ का नाम;
हर पल जिसके मन में,
सुत का ही हो ध्यान।
जानता हूँ मैं,
मेरी पसंद का भोजन बनाके,
चुपके-चुपके रोती होगी;
बचपन की हर यादों को,
हिय में संजोती होगी;
बहाती होगी चुपके-चुपके,
आँसुओं की धार;
राखी भेज रहा हूँ बहना,
तुमको ही इस बार;
रक्षा-वचन निभा देना,
तुम पर ही परिवार!
दुश्मन से कभी न हारे हैं,
न कभी हारेंगे;
माँ भारती के फ़ौलादी सुत हम,
चुन-चुनकर उसको मारेंगे!
टूट जाता हूँ मैं देश की,
आंतरिक कलहों से;
एहसास नहीं किसी को,
जूझ रहे हैं हम सीमा पर,
दर्द के किन लम्हों से!
आपस में ही हैं सब,
मर-मिटने को तैयार;
रक्षा-वचन निभा देना,
तुम पर ही परिवार!
तभी बजा दूरभाष,
उठा फोन पिता, लेकर बेटे की आश।
बहन पत्र पढ़ना रखे जारी,
रखकर हिय पर पत्थर भारी—
“माफ़ करना बहना मेरी,
जा रहा हूँ देके तुझे,
अपना सभी भार;
रक्षा-वचन निभा देना,
तुम पर ही परिवार!”
तभी द्वारे लग गई भीड़,
समझ गई बहना—
शहीद हुआ सहोदर वीर!
