सितंबर 2026

अवकाशप्राप्त प्रिन्सिपल, बसिया इंटर कॉलेज,
बसिया, जिला- गुमला, झारखंड
यह कहानी एक ऐसे साधारण-से मनुष्य की है, जिसने अभावों से ऊपर उठकर सफलता के शिखर तक पहुँचने का सफर तय किया है। यह कहानी उस बच्चे की है जिसने अपनी जड़ों और अपनी स्मृतियों के साथ अपने पहले सपने को कभी नहीं भूला। इसकी शुरुआत होती है, शीत से हाड़ कंपा देने वाली किसी ऐसी रात से जब एक सपने की स्याह रात ने खुद, सुबह की सुनहरी धूप का सपना देखा।
इस सपने की शुरुआत तब होती है जब धूप की तपिश इतनी सहज और सरल नहीं हुआ करती थी। गाँव की पगडंडियों पर हवा के विपरीत बहाव के कारण खेतों में जब झूमती धान की बालियों का हाल बेहाल बना रहता था, तब सपने देखना भी कोई सरल विषय नहीं होता था। यह कोई सामान्य-सी बात इसलिए भी नहीं थी क्योंकि अपने प्रारब्ध को दिल में संजोए एक दुबला-पतला, छोटे कद-काठी का लड़का अपनी पुरानी पड़ चुकी कमीज़ और घिसी पड़ी चप्पलों के बोझ से दबा पहली बार शहर में था और वहाँ के किसी महाविद्यालय के दरवाज़े पर दाखिला ले रहा था। इसे लेकर उसके मन में एक असाधारण-सा उत्साह ज़रूर था, परंतु साथ में यह भी पता था कि ऐसा कोई सपना तब बोझिल हो जाता है जब कमीज़ की फटी जेब में पैसे न हों। इतना ही नहीं, उसे यह भी पता था कि सपने देखने का अधिकार अक्सर संपन्न लोगों के हिस्से में आता है और अभावों में जीने वाले लोग सपने नहीं देखा करते, वे तो केवल जीवन काटने की कोशिश करते हैं।
राहत की बात यह थी कि धूल-भरी आंधी के बीच झूमती-इतराती धान की बालियों की प्रेरणा का आधार उसके साथ बना हुआ था। इतना ही नहीं, जब घिसी हुई चप्पल के बावजूद सपने भारी पड़ रहे हों और सूर्योदय की लालिमा का भरोसा कायम हो, तब बाधाएँ कभी बाँध नहीं बना करती हैं। यही भरोसा था जब वह अपने पूरे कुनबे का पहला व्यक्ति था, जिसने कॉलेज तक का सफर तय किया हो। इस सपने का कमाल यह भी था कि कॉलेज की देहरी पर कदम रखते ही उसके घर में मानों दीपावली उतर आई थी।
जीवन के अभावों को अपना श्रृंगार समझ बैठी माँ का सीना आज पहली बार चौड़ा हो रहा था और उनकी आवाज़ में अब एक गर्व था, एक खनक थी। पास में पैसे नहीं थे, तो उन्होंने कोई मिठाई नहीं बाँटी, लेकिन उनकी आँखों में जो चमक थी, वह चीख-चीखकर उत्सव मना रही थी कि अब मेरा बेटा भी पढ़ेगा। यह एक ऐसे मुहूर्त का उत्सव बनकर सामने था, जब उसे पहली बार यह लगा कि गरीबी चप्पल का श्रृंगार तो छीन सकती है, लेकिन माथे के श्रृंगार को कतई नहीं छीन सकती।
सबकुछ देख-सुनकर अब वह खुद को आश्वस्त करने लगता है कि दुनिया को केवल दूसरों की आँखों से नहीं, बल्कि अपनी आँखों से भी देखा जा सकता है। कॉलेज में प्रवेश की इस भूमिका से वह हैरान ज़रूर था क्योंकि अबतक तो अपनी नज़रों में ही वह खुद को कभी महत्वपूर्ण नहीं मान पाया था। आईना खुद इस बात का गवाह रहा है जहाँ उसे अपना कद हमेशा छोटा दिखता, गाल धँसे हुए दिखते और शरीर भी कुपोषित व दुबला-पतला दिखाई देता। उसके लिए यह कहानी भी कुछ ऐसी थी, जहाँ से चलकर हीन भावना धीरे-धीरे उसकी आत्मा तक उतर आई थी। उसे लगता कि ईश्वर ने सौंदर्य, आत्मविश्वास और प्रतिभा जैसे उपहार शायद दूसरों के लिए बनाए हैं और उसके हिस्से में केवल संघर्ष डाल दिया है। समाधान के लिए वह हर बार अपने प्रारब्ध में से कुछ-कुछ ढूँढने की कोशिश करता।
सवाल यहाँ भी वही थे, “क्या बनना चाहते हो?” जबतक यह सवाल भौतिक तौर पर सामने आता, तब तक ही वह कॉलेज गेट के अंदर आ चुका था। यहाँ तंद्रा टूट गई, उसने एक पल सोचा और फिर जवाब दिया, “मास्टर।” इस जवाब के बावजूद सवाल अभी यथावत बना हुआ था—’बस, इतना ही….. न आईएएस, न डॉक्टर, न इंजीनियर?’ अब वह हतप्रभ था; उस समय तो उसके लिए शिक्षक बनना ही बहुत बड़ा सपना था। उसे लगता था, अगर वह बच्चों को पढ़ा सके, ईमानदारी से जीवन जी सके और माँ के चेहरे पर थोड़ा-सा भी सुकून ला सके, तो इससे अधिक और क्या कुछ हो सकता है?
प्रारब्ध के इस दायरे से अभी वह बाहर निकल भी नहीं पाया था कि जीवन ने उसे एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी। धान की झूमती बालियों में भी एक सुखद सुगंध का बोध होता है। इसी सुगंध की प्रेरणा का कमाल था कि एक दिन उसके सामने एक बंद लिफाफा आ टपका। लिफाफा खोलते ही उसे यह जानकर हैरानी हुई कि यह कोई नियुक्ति-पत्र नहीं, एक प्रेम-पत्र है। एक सुसंपन्न परिवार से संबंधित किसी लड़की के इस प्रेम-प्रस्ताव को पढ़ते ही उसके तो मानों हाथ-पाँव फूलने लगे। उसे विश्वास ही नहीं हो पा रहा था कि कॉलेज की इस भीड़ में “मैं ही क्यों?” जैसा कोई प्रसंग कभी उसके सामने आ खड़ा होगा।
उस रात वह करवटें बदलता रहा और बहुत देर तक सो नहीं पाया। वैसे भी सपने प्रायः लोगों को सोने कहाँ देते हैं और यह भी तो एक सपना ही था। हाँ, इस सपने ने पहली बार उसे यह अहसास दिलाया कि प्रेम परवान चढ़े न चढ़े, इंसान की कीमत उसके चेहरे से, धन-दौलत से या चाल-चरित्र से नहीं, बल्कि उसके हृदय से होती है, अंतर्मन से होती है। उसके लिए ये विचार किसी चमत्कार से कम नहीं थे क्योंकि इस एक लिफाफे से उसके अंदर अब “मैं भी महत्वपूर्ण हूँ” जैसे किसी कालखंड का जन्म हो चुका था।
समय बीतता गया, आज हाथ में कॉलेज-परित्याग प्रमाण-पत्र (Transfer Certificate) है; वह कॉलेज के उसी गेट के बाहर खड़ा है जहाँ से कभी उसने प्रवेश लिया था। इस बार निगाहें अंदर नहीं, बल्कि सामने वाली सड़क पर टिकी हुई हैं। संदेश साफ है कि जीवन में संघर्ष यथावत बना हुआ है और यह अभी भी आसान नहीं है। उसे यह बखूबी याद है कि गेट से गेट की इस यात्रा के दौरान कितनी आर्थिक परेशानियाँ सामने आईं, कभी असफलताओं ने रास्ता रोका, कभी अपनों से चोट मिली और कभी परिस्थितियों ने उसके धैर्य की परीक्षा ली; परंतु यह जो सड़क है, वह आने-जाने वाले संघर्षों की आवभगत में अभी भी अपनी जगह पर यथावत कायम है। अनायास ही अब उसे लगने लगता है कि यदि यह सड़क न होती, तो शायद वह टूट-फूटकर कब का बिखर गया होता।
यही तो वह सड़क है, जो उसे हर पल दिलासा देती रही है कि तुम खुद में विशेष हो और महत्वपूर्ण हो, हार मत मानो। यह एक ऐसी तपस्या थी, जिसके बूते आखिरकार वर्षों की मेहनत काम आई और अंततः वह शिक्षक बन गया। पोस्टिंग हुई और पहली बार जब उसने बच्चों के सामने खड़े होकर उपस्थिति-पंजी (Attendance Register) खोली, तो उसकी आँखें नम थीं; क्योंकि आज फिर से माँ याद आ रही थीं।
आँखों की इस नमी का संदेश साफ था, “माँ, तुम्हारा बेटा मास्टर बन गया है।” उस दिन उसे लगा मानों उसने पूरी दुनिया जीत ली है।
दूसरी ओर, सड़क की अंतहीन यात्रा को शायद यह मंजूर नहीं था कि इस जीत से वह इतरा सके। तमाम तरह के उतार-चढ़ावों के साथ जीवन आगे बढ़ता गया। अब जीवन की यात्रा को क्या मंजूर था, इसकी परवाह किए बगैर मेहनत, ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति संवेदनशीलता का एक संकल्प सामने था। एक दिन अचानक से वही साधारण-सा युवक, जो कभी मास्टर बनने के छोटे-से सपने के साथ चला था, आज यूपीएससी (UPSC) परीक्षा के बाद एक उच्च अधिकारी के पद पर जा पहुँचा। समाज में अब उसका एक सम्मान था, उसके निर्णयों का प्रभाव हजारों लोगों के जीवन पर पड़ने लगा था और बड़े-बड़े लोग उससे मिलने का समय माँगते, लेकिन उसके भीतर कुछ भी नहीं बदला था।
वह आज भी स्वयं को एक शिक्षक मानता था। उसके कार्यालय की दीवार पर उपलब्धि का कोई प्रमाण-पत्र नहीं, बल्कि उस माँ की तस्वीर लगी हुई है, जिसके बल पर उसके पास आज “सबकुछ” था। इस “सबकुछ” का कमाल यह कि एक दिन एक युवा अधिकारी ने उससे पूछ ही लिया, “सर, इतनी ऊँचाई तक पहुँचने के बाद भी आप इतने सरल कैसे बने रह पाते हैं?” उसने मुस्कुराते हुए माँ की तस्वीर की ओर देखा और धीरे से कहा, “जब मेरे पास धन नहीं था, ज्ञान नहीं था, रूप नहीं था, आत्मविश्वास नहीं था और कुछ भी नहीं था, तब भी किसी ने मुझसे प्रेम किया था; क्योंकि मेरी माँ न केवल मेरे साथ थीं, बल्कि मुझे महत्वपूर्ण भी मानती थीं। आज मैं एक महत्वपूर्ण शख्सियत हूँ, तो इसलिए नहीं कि समाज मुझे सम्मान देता है, लोग खड़े होकर मुझे सलाम करते हैं या मैं एक उच्च अधिकारी हूँ। मैं तो महत्वपूर्ण इसलिए हूँ क्योंकि ईश्वर की इस विराट सृष्टि में मेरा भी एक उद्देश्य कायम है और मेरी माँ इस भव्य उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर पल सुदर्शन धारण किए मेरे सामने हैं!”
