सितंबर 2026

शरदनाथ खरे साहब ने ऑफिस के बाहर निकलते ही भीड़, हल्ला और हुड़दंग देखा। उनका मन यह सब देखकर कड़वाहट से भर गया। सुबह से ही उनका मन खराब था। वह घर से तो समय पर निकले थे, मगर रास्ते में नवरात्रि का पहला दिन होने के कारण सड़क पर एक धार्मिक जुलूस के जाम में फँस गए। ऑफिस देर से पहुँचे, तो पाया कि उनके सीनियर अफसर उनके समय पर न पहुँच पाने पर नाखुशी ज़ाहिर कर चुके हैं। बस तभी से उनका मन खराब था।
अब फिर कोई हुड़दंग देखकर उनका मन कसैला हो गया और उनकी गाड़ी जाम में फँस गई। उन्होंने झल्लाते हुए अपने ड्राइवर को भेजा कि मसले का पता लगाए और वैकल्पिक रास्ते का भी। उनका ड्राइवर कुछ बता पाता, तब तक उन्होंने देखा कि मेन रोड पर खुलती गली के एक होटल से मुँह ढँके एक लड़की और एक लड़के को संस्कृति रक्षा दल के लड़के बाहर ला रहे थे।
वे लड़के लड़की को तो चुपचाप पकड़े हुए लेकर आ रहे थे, पर लड़के की अच्छी-खासी पिटाई कर रहे थे। संस्कृति रक्षा दल के लोग चिल्लाते हुए कह रहे थे कि यह गैर-मज़हबी लड़का इस हिंदू लड़की के साथ रंगरलियाँ मना रहा था।
“जब से यह सरकार आई है, तब से ये सड़कछाप लोग तमाशा ही करते रहते हैं। इन्हें काम-धंधा तो कुछ करना नहीं रहता, सिर्फ लॉ एंड ऑर्डर डिस्टर्ब करते रहते हैं। ये रास्कल्स, गुंडे कहीं के! बड़े आए रक्षा दल वाले रक्षा करने… नालायक, निकम्मे, बेरोज़गार सब के सब!”—ऐसा ही कुछ कहते हुए और अनगिनत गालियाँ संस्कृति रक्षा दल वालों को बकते हुए वह घर आ गए।
झुंझलाते और झल्लाते हुए उन्होंने टीवी खोला। टीवी पर भी वही दृश्य था। उन्होंने फिर कोई गंदी सी गाली बकी। मिस्टर खरे बड़बड़ा उठे, “इस देश में कॉन्स्टिट्यूशन का नहीं, बल्कि इन अनपढ़-जाहिल रक्षा दल वाले गुंडों का राज चलेगा? पुलिस और कोर्ट का नहीं, बल्कि इन लफंगों का सिस्टम चलेगा क्या? लड़की अपनी मर्जी से किसी भी धर्म के लड़के के साथ जाती है, तो इन जाहिलों के पेट में क्यों मरोड़ उठ रही है? कॉन्स्टिट्यूशन उन्हें अलाउ कर रहा है, तो इसमें मज़हब बीच में कहाँ से आ गया?”
“काहे खून जला रहे हैं अपना जब से आए हैं तब से? लीजिए, ठंडी लस्सी पीजिए और अपना दिमाग थोड़ा ठंडा रखिए,” उनकी पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“तुम कुछ नहीं समझती। असल बात यह है कि…,” तभी कॉलबेल बजी।
उनकी पत्नी ने दरवाजा खोला और किसी से कुछ बातचीत की। कुछ देर बाद वहीं से आवाज़ लगाई, “कुछ लड़के हैं, देखिए आपसे ही कुछ बात करना चाह रहे हैं।”
उसी अवस्था में झल्लाते हुए मिस्टर खरे बाहर आए। उन लड़कों के झुंड को देखते ही उनका पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। यह उन्हीं लड़कों का पूरा झुंड था, जिन्हें उन्होंने कुछ देर पहले सड़क पर देखा था। सभी लड़के गले में भगवा गमछा डाले हुए थे।
“क्यों आए हो? कोई चंदा-वंदा नहीं मिलेगा भंडारे-वंडारे का! तुम लोग वही हो न, जो अभी उस बेचारे गैर-मज़हबी लड़के को मार-पीट रहे थे? अब भंडारे के नाम पर धन-उगाही करने आए हो क्या? एक फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे। मुझसे गुंडई नहीं चलेगी! मैं पुलिस बुला लूँगा, मुझसे ज़बरदस्ती चलेगी नहीं!”—गुस्से से चीखते हुए मिस्टर खरे ने कहा।
उनमें से एक लंबे कद के लड़के ने आगे आते हुए कहा, “शांत रहिए अंकल जी, हम यहाँ आपसे कुछ लेने नहीं आए हैं, बस आपको कुछ लौटाने आए हैं। ऊँचा-ऊँचा नहीं बोलिए अंकल जी, घर की बात घर में ही रहे तो बेहतर है।“
मिस्टर खरे थोड़ा हैरान हुए और सकपकाए भी। उन्हें अजीब लगा कि इन सड़कछाप लड़कों से उनके घर की बात का कौन-सा कनेक्शन हो सकता है! वह कुछ समझ पाते, तब तक उन लड़कों का झुंड एक तरफ हट गया और एक लड़की घर के अंदर चली गई। उस लड़की का चेहरा भी उसी रंग के गमछे से ढँका हुआ था, जैसे गमछे बाकी लड़कों ने पहन रखे थे।
जो लड़की घर के अंदर गई थी, वह मिस्टर खरे की युवा बेटी अवंतिका उर्फ एंजेल थी, जो बारहवीं क्लास में पढ़ती थी।
उन लड़कों के झुंड का मुखिया लड़का धीरे से बोला, “ओ अंकल जी! हमने सिस्टर को कुछ नहीं होने दिया। पुलिस-वुलिस का भी कोई झंझट नहीं होने दिया है। चेहरा भी किसी को नहीं देखने दिया। बच-बचाकर लाए हैं सिस्टर को, ताकि बदनामी न हो और घर की बात घर में ही रहे। वैसे ही मीडिया में इस खबर का हल्ला मचा हुआ है। आपकी बेटी होटल में एक गैर-मज़हबी बदमाश आदमी के साथ थी। वह पहले भी कई लड़कियों को अपने प्रेम-जाल में फँसाकर खराब कर चुका है। वह शादीशुदा आदमी है और शातिर है। ऐसे ही अच्छे घरों की भोली-भाली लड़कियों को अपने प्रेम-जाल में फँसाता है और उनकी ज़िंदगी खराब कर देता है। उस बदमाश आदमी पर काफी दिनों से हमारी नज़र थी। आज हमने उसे रंगे हाथ पकड़ा और उसका कायदे से इलाज कर दिया। आपकी बेटी सेफ है, उसे कुछ नहीं हुआ। थोड़ा ख्याल रखा कीजिए कि आपकी बेटियाँ कहाँ जाती हैं, किससे मिलती हैं। हमारा जो काम था, वह हमने कर दिया और आगे भी करते रहेंगे। आप हमें गुंडा समझते हैं तो कोई बात नहीं, पर हम यह सब करते रहेंगे। चलते हैं अंकल जी… राम-राम!”—यह कहकर अभिवादन करते हुए वे सब लड़के चले गए।
मिस्टर खरे घर के अंदर आ गए। उन्होंने दरवाजा बंद कर लिया। टीवी पर अब भी वही खबरें आ रही थीं कि “संस्कृति रक्षा दल वालों की गुंडई चरम पर पहुँच चुकी है। इन गुंडों ने एक गैर-मज़हब के निर्दोष व्यक्ति को मार-मारकर अधमरा कर दिया।”
मिस्टर खरे टीवी देख तो रहे थे, मगर उन्हें अब इन खबरों पर गुस्सा नहीं आ रहा था।
