इससे पहले कि मैं अपनी कहानी शुरू करूँ, कहानी की मुख्य नायिका सारिका से आपका परिचय करवा दूँ।
39 वर्ष की सारिका एक बेहद आकर्षक, उच्चशिक्षित और संभ्रांत परिवार की लड़की है। वह पेशे से वकील है और जल्द ही भारत सरकार की वरिष्ठ विधि अधिकारी (Law Officer) बनने जा रही है। इसके लिए होने वाली प्रतियोगी परीक्षा वह पास कर चुकी है; बस एक छोटी-सी ट्रेनिंग के बाद उसकी जॉइनिंग हो जाएगी। एक शानदार घर, बेहतरीन सैलरी और साथ में समाज में ऊँचा रुतबा—यही सब तो वह हमेशा से चाहती थी! आज उसे वह सब मिल रहा है। उसके घरवाले भी उसकी इस उपलब्धि पर बेहद खुश हैं। पर वह चाहकर भी खुश नहीं हो पा रही है। ऐसा क्यों है, यह तो वह खुद भी नहीं समझ पा रही। शायद स्वास्तिक की कमी उसे अंदर ही अंदर खल रही है। न जाने क्यों, जिस चिर-प्रतीक्षित सपने के पूरे होने पर उसे उत्तेजना और प्रसन्नता होनी चाहिए थी, उसकी जगह वह खुद को हारा हुआ महसूस कर रही है।
सारिका और स्वास्तिक की प्रेम कहानी पर भी बात होगी, पर उससे पहले इस कहानी के कुछ अन्य पात्रों से मिल लेते हैं।
गोरखपुर के एक साधारण-से वकील थे सारिका के पिता—अनिरुद्ध जी। चार-पाँच दिनों में कोई एक केस कोर्ट में लग गया, तो वही उनके लिए बहुत था। लोग कहते हैं कि दिल्ली बड़ा शहर है, देश की राजधानी है, सुप्रीम कोर्ट भी वहीं है और वहाँ के वकीलों की बात ही अलग होती है— वे लाखों-करोड़ों कमाते हैं। अनिरुद्ध जी को तो खुद यह मौका नहीं मिल सका, लेकिन वे अपने बच्चों को वे सभी अवसर देना चाहते थे, जो उन्हें कभी नहीं मिले। उन्होंने सारिका को शहर के सबसे अच्छे स्कूल और कॉलेज में पढ़ाया। दिल्ली यूनिवर्सिटी के लॉ कॉलेज में जब सारिका का एडमिशन हुआ, तो खुशी के मारे अनिरुद्ध जी ने घर पर रामायण का पाठ करवाया था। उनका बस एक ही सपना था कि बेटी जज या कोई बड़ी अधिकारी बन जाए।
बेटी ने भी उन्हें निराश नहीं किया। एक छोटे-से शहर से आकर दिल्ली जैसे महानगर में अपनी एक अलग पहचान बनाना कोई साधारण बात नहीं थी। माँ-बाप तो पहले से ही उस पर नाज़ करते थे, अब उनका सिर गर्व से और ऊँचा हो गया था। बस उन्हें एक ही चिंता सताती रहती थी कि बेटी अकेले अपनी पूरी ज़िंदगी कैसे काटेगी। सारिका अक्सर यह कहकर उन्हें झिड़क देती— “इतने सालों से अकेली ही तो खुशी-खुशी रह रही हूँ! अकेले रहने में क्या बुराई है? जब होनी होगी, शादी भी हो ही जाएगी। और फिर, किस चीज़ की कमी है मेरे पास? क्या शादी के बिना ज़िंदगी पूरी नहीं होती?” माँ-बाप चुप रह जाते, पर वे भी जानते थे कि उम्र के ढलने पर पति और परिवार का साथ कितना ज़रूरी हो जाता है।

पर इसमें सिर्फ़ सारिका की ही ग़लती नहीं थी। उसके माता-पिता भी तो बचपन से उसके दिमाग़ में यही बात भरते आए थे कि उसे कुछ ऐसा करना है, जिससे समाज में उसके पिता शान से सिर उठाकर चल सकें, लोग उनसे रश्क करें और अपनी बेटियों को सारिका जैसा बनाने का सपना देखें। सारिका की छोटी बहन मोनिका और भाई मनीष का मन पढ़ाई-लिखाई में ज़्यादा नहीं लगता था। मोनिका तो बी.ए. करने के बाद ही शादी के लिए तैयार हो गई थी। मनीष अपना बिज़नेस करना चाहता था और उसने वही किया भी। जब उसका बिज़नेस अच्छा चलने लगा, तो माता-पिता को छोटे भाई-बहनों की शादी टालना सही नहीं लगा। लेकिन बड़ी बहन से पहले छोटे भाई-बहनों की शादी करना भी सामाजिक रूप से सही नहीं माना जाता था।
हालाँकि, सारिका को इसमें कोई आपत्ति नहीं थी। वैसे भी उसके पीछे लड़कों की कोई कमी थोड़े ही थी! कितने ही लड़के उससे शादी करना चाहते थे और कई-कई सालों से उसके ‘हाँ’ कहने का इंतज़ार कर रहे थे। मोनिका शक्ल-सूरत में सारिका की तुलना में साधारण ही थी और मनीष अच्छा कमाने लगा था, इसलिए उनकी शादी में कोई रुकावट नहीं थी। माँ ने भी सारिका का ही पक्ष लिया— “सारिका की शादी तो जब वह चाहेगी, हो जाएगी। फिर वह इतनी स्मार्ट और पढ़ी-लिखी है, किसी ऐरे-गैरे से शादी थोड़े ही करेगी!”
अंततः यह तय हुआ कि पहले छोटे भाई-बहनों की शादी कर दी जाए; सारिका का करियर जब अच्छी तरह सेटल हो जाएगा, तब वह अपने स्टेटस के लड़के से शादी कर लेगी। तीनों भाई-बहनों में तीन-तीन साल का अंतर था। इसलिए जब 26 वर्ष की उम्र में मोनिका की शादी हुई, तब सारिका 29 की हो चुकी थी।
समय पंख लगाकर उड़ता गया। मोनिका और मनीष के बच्चे बड़े होने लगे। धीरे-धीरे सारिका के पीछे शादी के लिए लगने वाली लड़कों की लाइन छोटी होने लगी। अब विवाह के प्रस्ताव लगभग न के बराबर आते थे। जो आते भी, वे उसके स्टेटस से मेल नहीं खाते थे। किसी लड़के के सिर पर बाल नहीं थे, तो किसी का पैकेज कम था; कोई किसी दूसरे शहर में रहता था, पर सारिका दिल्ली छोड़कर कहीं जाना नहीं चाहती थी।
अरे! स्वास्तिक की कहानी तो बीच में ही छूट गई।
स्वास्तिक सारिका की एक सहेली का छोटा भाई था। उम्र में उससे सात साल छोटा, लेकिन दिखने में दोनों की जोड़ी बहुत अच्छी लगती थी। एमबीए करने के बाद स्वास्तिक एक नामी कंपनी में कार्यरत था। नोएडा में उसका ऑफिस था और पास ही उसने एक फ्लैट ले रखा था। सारिका उसके जॉब प्रोफ़ाइल और सैलरी पैकेज से बहुत ज़्यादा खुश तो नहीं थी, फिर भी स्वास्तिक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा सम्मोहन था, जो उसे अपनी ओर खींचता था। सारिका उसे उसकी तमाम कमियों के साथ अपनाने को तैयार थी।
एक दिन जब दोनों डिनर पर गए, तो अचानक स्वास्तिक के पेट में उठते तेज़ दर्द ने सब कुछ बदल दिया। जाँच कराने पर पता चला कि उसे ‘लिवर सिरोसिस’ (Liver Cirrhosis) जैसी गंभीर बीमारी है। स्वास्तिक ने यह बात अब तक सारिका से छिपाकर रखी थी।
सारिका ने पूरी रात इंटरनेट पर इस बीमारी के बारे में रिसर्च करने में बिता दी। उसने कई बड़े डॉक्टरों से मुलाकात की। हालाँकि बीमारी बेहद गंभीर और जानलेवा स्थिति में थी और स्वास्तिक ने यह बात उससे छिपाई भी थी, फिर भी सारिका को उस पर गुस्सा नहीं आया— केवल चिंता हुई। वह किसी भी तरह उसे स्वस्थ देखना चाहती थी।
सारिका, जो अब तक ज़िंदगी के हर फ़ैसले दिमाग़ से लेती आई थी, पहली बार दिल के हाथों हार रही थी। स्वास्तिक की बीमारी जानलेवा थी, उसका सच छिपाना एक धोखा था, लेकिन सारिका के भीतर की ‘स्त्री’ उस बीमार इंसान को सँभालने और सहेजने के लिए तैयार थी। वह चाहती थी कि स्वास्तिक की ज़िंदगी का जितना भी समय बचा है, वह उसके साथ ही बिताए। उसे अब जाति, समाज या परिवार की कोई परवाह नहीं थी। यहाँ तक कि अपने माता-पिता की इच्छा के खिलाफ जाकर भी वह उससे शादी करने को तैयार थी।
पर कहते हैं न, हर प्रेम कहानी में कोई न कोई विलन आ ही जाता है। इस कहानी में स्वास्तिक की माँ विलन बन गईं। पहली मुलाकात में जब उन्होंने सारिका को देखा, तो वह उन्हें बहुत पसंद आई। लेकिन जब अपनी बेटी से उन्हें सारिका की असली उम्र का पता चला, तो वे बेहद परेशान हो गईं। 39-40 वर्ष की महिला एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है या नहीं, इस पर उन्हें गहरा संदेह था। वे चाहती थीं कि उनके इकलौते बेटे की बहू कम-से-कम इतनी सक्षम हो, जो दो-तीन स्वस्थ बच्चों को जन्म दे सके और उनका पालन-पोषण कर सके। इसके अलावा, पिछले 25 वर्षों से अकेले और स्वतंत्रता से रहने वाली लड़की उनके परिवार में सामंजस्य (Adjust) बिठा पाएगी, इस पर भी उन्हें भरोसा नहीं था।
अंततः बेटे ने अपनी माँ का साथ दिया और सारिका से शादी करने से साफ़ मना कर दिया। केंद्र सरकार में लॉ ऑफिसर बनने की सारिका की सफलता भी स्वास्तिक के फ़ैसले को डिगा नहीं पाई।
कितनी बड़ी विडंबना थी! सारिका ने जिस पुरुष को मौत के साये में खड़े होने के बावजूद अपनाया था, उसी पुरुष और उसके परिवार ने सारिका की ढलती उम्र को अक्षम्य अपराध मान लिया।
न जाने कितने ही लड़कों का दिल तोड़ने वाली सारिका का दिल पहली बार टूटा था। उसे शादी न हो पाने का उतना अफ़सोस नहीं था, जितना उसके स्वाभिमान को गहरी ठेस पहुँची थी। जिस व्यक्ति को उसने उसकी बीमारी, कम डिग्री और कम सैलरी के बावजूद पूरे दिल से अपनाया था, वही व्यक्ति सारिका की केवल एक कमी—उम्र—को स्वीकार नहीं कर सका! यह बात उसके आत्मसम्मान से बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
मानिनी सारिका का मान टूट चुका था। उसका आत्मविश्वास बुरी तरह हिल गया था।
क्या वह एक ‘पूर्ण स्त्री’ नहीं है?
क्या ढलती उम्र ने उसके ‘स्त्रीत्व’ को अपूर्ण कर दिया है?
क्या उसकी तमाम उपलब्धियाँ, पद और प्रतिष्ठा उस ‘अपूर्ण स्त्रीत्व’ को पूर्ण नहीं कर सकतीं?
सारिका ने उम्र भर दूसरों के मुक़दमों में नफ़ा-नुक़सान और तर्क का हिसाब लगाया, लेकिन जब अपनी ज़िंदगी का जोड़-घटाव करने बैठी, तो सारे गणित फ़ेल हो गए। सारिका ने अपने सामने रखे भारत सरकार के पत्र की मोहर को देखा। उस पर लाल फ़ीता बँधा था और सुनहरे अक्षरों में उसकी सफलता दर्ज थी। यह पद, ओहदा और पैसा किस काम का, अगर यह उसके जीवन के इस अकेलेपन और कमी को पूरा न कर सके?
सारिका जीवन के इस जोड़-घटाव का गणित नहीं बिठा पा रही थी कि उसने अपनी प्रतिभा और दिन-रात की मेहनत से क्या पाया और क्या खोया! वह फ़ायदे में रही या नुकसान में? और इसी जोड़-घटाव के फेर में ज़िंदगी और उम्र चुपचाप हाथों से फिसलती जा रही थी।
बबीता झा, दिल्ली
19.10.2024
