अनाथालय में बदलता समाज

दिसंबर, 2023
बबीता झा

एक दिन एक वृद्धा न्यायालय के चक्कर लगाती हुई मिलीं। पूछने पर ज्ञात हुआ कि उनका इस संसार में कोई अपना नहीं था।

“ससुराल, मायका, पड़ोसी या मित्र… कोई तो होगा?”

“पति की मृत्यु के पश्चात रिश्तेदारों ने संबंध तोड़ लिया। तीन बेटे थे, तीनों का देहावसान हो गया। बेटी अपने ससुराल में है। मैं यहाँ किराए के मकान में रहती हूँ। किराए का घर तो बदलता रहता है, इसलिए किसी पड़ोसी से भी गहरे संबंध स्थापित न हो सके।”

तथ्यों की गहराई में जाने पर पता चला कि उनके पति ट्रक चालक थे। वे अपने गाँव से अपने हिस्से की भूमि बेचकर शहर आ गए थे। इसके बावजूद वे गाँव की शेष संपत्ति पर अपना अधिकार जताते थे। इसी कारण उनके अपने पिता और भाई से संबंध कभी मधुर नहीं रहे। एक गंभीर बीमारी से उनकी मृत्यु के बाद, जमा-पूँजी के सहारे ही कुछ वर्षों तक परिवार का पालन-पोषण होता रहा।

दुर्भाग्यवश, पति के निधन के कुछ ही वर्षों पश्चात उनके दो बड़े बेटों की भी बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। तीसरे और सबसे छोटे बेटे का विवाह हुआ, बहू अच्छी थी; किंतु दैव का विधान! एक सड़क दुर्घटना में तीसरे बेटे की भी असमय मृत्यु हो गई।

दुर्घटना के एवज में मिलने वाली क्षतिपूर्ति (मुआवज़े) की राशि की अब दो दावेदार थीं—एक ओर वृद्ध माँ और दूसरी ओर उसकी विधवा बहू। माँ को यह भय सताने लगा कि यदि बहू को क्षतिपूर्ति के पैसे मिल गए और उसने पुनर्विवाह कर लिया, तो उसका सहारा कौन बनेगा? इसलिए उसने चाहा कि यह धनराशि बहू को न मिले। माँ ने अपनी विधवा बहू को बलपूर्वक घर से निष्कासित कर दिया और पूरी धनराशि की स्वयं अकेली दावेदार बन बैठी। इस प्रकार, वह वृद्धा बैंक में जमा कुछ लाख रुपये के बल पर सर्वथा अकेली रह गई।

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वर्षों तक वह एक ऐसी बीमार और असहाय महिला के घर में किराएदार बनकर रही, जिसकी मृत्यु निकट थी। इस वृद्धा को यह आशा थी कि उस गृहस्वामिनी की मृत्यु के पश्चात उस घर पर उसका अधिकार हो जाएगा।

इस प्रकार, एक भरे-पूरे घर की बेटी और भरे-पूरे घर की बहू अंततः एक अनाथ व विधवा वृद्धा बन गई। पति और संतानों की मृत्यु ने उसे उतना अनाथ नहीं बनाया, जितना अपनी जड़ों से कटने और धन के अति-लोभ ने बना दिया।

महानगरों का निष्ठुर यथार्थ
दिल्ली के प्रसिद्ध एम्स (AIIMS) अस्पताल की ओपीडी (OPD) की पंक्तियों में एक वृद्ध सज्जन खड़े थे। उनके हाथों में एक थैला था, जो एक प्लास्टिक पाइप के माध्यम से सीधे उनके पेट से जुड़ा हुआ था। उन्हें उस दयनीय स्थिति में लाइन में खड़े देखकर रोंगटे खड़े हो जाते थे। यथायोग्य सहायता करने के उपरांत जब उनसे बातचीत हुई, तो पता चला कि वे पेट के कैंसर से पीड़ित थे।

उनका बेटा एक छोटी सी नौकरी करता था। यदि वह एक दिन का अवकाश लेता, तो उसकी एक दिन की मज़दूरी कट जाती। वेतन पहले से ही पारिवारिक आवश्यकताओं की तुलना में बहुत कम था। अतः पिता-पुत्र ने मिलकर यह विवशतापूर्ण निर्णय लिया कि बेटा काम पर जाएगा और बीमार पिता स्वयं ही अकेले डॉक्टर को दिखाने जाएँगे।

दिल्ली जैसे महानगरों में मार्ग के किनारे रोते हुए एकाकी लोग अथवा अपने दुखों से कातर होकर नशे की धुत अवस्था में पड़े लोग दिखना अत्यंत सामान्य बात हो गई है। सड़कों पर भीख माँगते या रैन बसेरों में रात बिताते अनेक लोगों के विषय में जानकारी जुटाने पर पता चलता है कि वे कभी एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार के सदस्य थे। आज भी उनके परिवार के कई लोग जीवित हैं और सर्वसुविधायुक्त जीवन व्यतीत कर रहे हैं।

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मध्य प्रदेश के एक गाँव से सुंदर जीवन का स्वप्न लेकर दिल्ली आए ‘मनीष’ ने गाँव की पैतृक भूमि बेचकर यहाँ एक छोटा सा फ्लैट खरीदा। फ्लैट उसके कार्यस्थल से दूर था, इसलिए उसने उसे किराए पर दे दिया और स्वयं कार्यस्थल के समीप दूसरा फ्लैट किराए पर ले लिया। जब कोरोना महामारी का भय व्याप्त हुआ, तो मकान मालिक ने बुखार की अवस्था में ही उसे घर से बाहर निकाल दिया। चिकित्सालयों में स्थान उपलब्ध नहीं था, और न ही आसपास कोई अपना था। जर्जर शरीर अत्यधिक भाग-दौड़ सहन न कर सका; वह थककर एक वृक्ष के नीचे लेट गया। एक समाज सेवी संस्था (NGO) के सहयोग से उसे प्राथमिक उपचार तो मिला, किंतु सिर छुपाने को छत न मिल सकी। अंततः उसी वृक्ष के नीचे एक अनाथ की भाँति उसने अपनी अंतिम साँस ली।

अनाथपन का मूल कारण और समाधान
हम अपने आसपास इतने सारे अनाथ या लगभग अनाथ लोगों को देखते हैं। कहाँ से आते हैं ये लोग? क्या वास्तव में इनका कोई नहीं होता? पूर्व में तो इतने अनाथ नहीं दिखाई देते थे!

इसका मुख्य कारण यह है कि पारिवारिक ढाँचा पूरी तरह बिखर चुका है। हम सभी अपनी संकुचित स्वार्थी दुनिया में सिमटते चले गए। संबंध निभाना अब खर्चीला और समय नष्ट करने वाला लगने लगा है। परिवार की परिभाषा अत्यंत सीमित हो गई है—परिवार का अर्थ अब केवल पति, पत्नी और बच्चे रह गए हैं; अधिक से अधिक इसमें दादा-दादी या नाना-नानी को सम्मिलित कर लिया जाता है।

नाते-रिश्तेदार और पड़ोसी अब ऐसे प्राणी माने जाने लगे हैं जिनका कार्य केवल ईर्ष्या करना या हमारी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप करना रह गया है। परिणामस्वरूप, जब इस छोटे से एकाकी परिवार पर कोई आपदा आती है, तो हम स्वयं को पूर्णतः अनाथ महसूस करने लगते हैं। हम यह भूल गए कि हम भी तो किसी के रिश्तेदार हैं, हम भी किसी के पड़ोसी हैं!

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यदि हम अब भी अपनी इस खोखली स्वतंत्रता और अहंकार के आवरण से बाहर नहीं आए, तो वह दिन दूर नहीं जब संपूर्ण समाज अनजान लोगों की एक भीड़ मात्र बनकर रह जाएगा, और हम सब उस भीड़ में एकाकी व अनाथ होंगे।

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