आरती का अर्थ

सितंबर 2026

डॉ अंजना गर्ग

घुमंतू उस दिन मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा था। भीतर घंटों की आवाज़ थी, बाहर भीड़ का शोर।
अष्टमी थी—कंजकों के पैर धोए जा रहे थे। लोग इतने झुके हुए थे कि लगता था मानो आज ही माँ भवानी को खुश करके सब कुछ पा लेना चाहते हैं।
घुमंतू की नज़र सीढ़ियों से थोड़ा हटकर गई—एक औरत ज़मीन पर चटाई बिछाए बैठी थी। सामने पाँच लड़कियाँ थीं, जो शायद फूल बेचने वाली थीं। उनके हाथ में पेंसिल, माथे पर पसीना और आँखों में ज़िद थी।
“दो और दो?”
“चार!” एक ने उछलकर कहा।
भीतर से आरती गूँजी—“जय अम्बे गौरी…”
एक आदमी ने भौंहें चढ़ाते हुए घुमंतू से कहा,
“आजकल लोग आरती छोड़कर क्या-क्या करने लगे हैं, देखिए…”
घुमंतू मुस्कुराया,
“नहीं, माँ की आरती तो सही मायने में वही कर रही है…”
“कहाँ? कैसे?”
घुमंतू ने उसी ओर इशारा किया—
“बस फ़र्क़ इतना है कि वह माँ को खुश करने के बजाय… माँ बनने वाली ज़िंदगी को मज़बूत कर रही है।”
वह आदमी चुप हो गया।
घुमंतू ने मन ही मन सोचा—
“शायद माँ को अब आरती की आवाज़ से ज़्यादा… पेंसिल और कागज़ की खड़खड़ाहट पसंद आने लगी है।”

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