सितंबर 2026

इंदौर
बरसात बाद में आती है, गड्ढे पहले आ टपकते हैं। फिर बारिश की बूंदें रो-रोकर गिरती हैं और लोग गड्ढों में गिरते हैं। तब आमजन का सड़क पर गड्ढों का रोना-धोना और उनसे पनपी समस्याओं का रोना-पीटना शुरू हो जाता है।
वैसे गड्ढे कहाँ नहीं हैं? सुना है चंद्रमा पर भी हैं। मंगल ग्रह पर तो हमारा उपग्रह गड्ढे में ही उतरा था, तभी हमारा ‘मिशन मंगल’ कुछ दिनों के वास्ते गड्ढे में चला गया था। जनता को गड्ढों से ज़्यादा दिक्कत रहती है, ख़ास तौर से सड़कों के। सब सड़क की चिकनी, सपाट और गड्ढाविहीन सतह के मुरीद हैं। लोगों का चेहरा चाहे खुरदरा हो, चरित्र दरदरा हो, किंतु सड़क सपाट और चिकनी होनी चाहिए।
कभी चेचक रोग से पीड़ित व्यक्ति के चेहरे पर दाग-गड्ढे हो जाते थे, तो लोग व्यंग्य कसते थे—”वह चाँद तो है ही, सितारे भी साथ में हैं।” यानी गड्ढे भी स्टार बन जाते हैं! यूँ तो बरसात में गड्ढे सुपरस्टार रहते हैं, भरपूर चौमासे चर्चा में रहते हैं।
गड्ढे कहाँ नहीं हैं? व्यापार में, राजनीति में, खेल में, पढ़ाई में— जिधर गड्ढा पड़ा, भाई-लोग रोने लगते हैं। कहते हैं, चरित्र का गड्ढा सबसे ख़तरनाक होता है। कुछ लोग इन्हें झोल, हानि, नुकसान, घाटा जैसे समानार्थी शब्दों से भी बुलाते हैं। दुनिया में गड्ढे न होते तो पचास करोड़ के एक्सप्रेसवे पर विरोधी लोग कहाँ झोल ढूँढ़ते? कैसे शिकायत करते? गड्ढे अवनति के प्रतीक ज़रूर हैं, किंतु विरोधियों के वास्ते ये रामबाण हथियार हैं।
विश्व के समस्त इंजीनियर गड्ढा भरने में लगे रहते हैं और डंपी लेवल (Dumpy Level) से माथापच्ची कर उन्हें पैदा होने से बचाते हैं; परंतु बेरहम बरसात इस मौसम में न जाने कहाँ से इन्हें जन्म दे देती है! सड़कों के गड्ढे ज़्यादा ख्याति प्राप्त करते हैं और सालाना हज़ारों लोगों की जान लेते हैं, उनके प्राण हरते हैं। फिर चिल्लाचोट मचती है और पाँच-पंद्रह सरकारी कर्मी निलंबित (Suspend) होते हैं।
सारी दुनिया गड्ढों के पीछे पागल है, दीवानी है। चिकनी, समतल और सपाट सड़क की कोई प्रशंसा नहीं करेगा; लेकिन ज़रा-सा गड्ढा, असामान्य सतह हुई नहीं कि उसकी खूब चर्चा होगी, ढेरों फोटो छपेंगे, शिकवा-शिकायतें होंगी! गोया गड्ढा न हुआ, विशाल कुँआ हो गया। अरब देश वाले इन गड्ढों से तेल निकाल कर झाँकी जमा रहे हैं और हम इनके पीछे पगला रहे हैं, लड़ रहे हैं, शिकायतों में उलझे पड़े हैं!
ज्ञानवान लोग कहते हैं कि गड्ढे पुरातन काल, महाभारत काल से कायम हैं। तभी तो कर्ण का रथ इन्हीं गड्ढों में फँसा पड़ा था। शिकायती लोग इतने फ़ुरसती होते हैं कि वे गड्ढों के नाप लेकर फोटो सहित अख़बारों में भन्नाट ख़बर छपवाते हैं और बिचारे(?) सरकारी कर्मियों को अकारण बदनाम करते हैं; जबकि सरकार सालाना लाखों रुपये इनको भरने के लिए प्रावधानित करती है! ईश्वर या सरकार जाने कि ये प्रस्तावित लाखों रुपये उपयोग में आते हैं या गड्ढे में जाते हैं? विरोधी दल सदनों में इन गड्ढों के नाम पर कई घटनाएँ बताते हैं, किंतु सत्ता पक्ष उनकी बुलंद आवाज़ इन गड्ढों में ही दफ़न कर देता है।
महाभारत कालीन ये गड्ढे अब भी चर्चा में, ख़र्चे में कायम हैं। लोगों की धारणा चाहे इनके प्रति अच्छी न हो, परंतु इनके खुदने पर ही कुँआ निर्माण होता है जो पेयजल उपलब्ध कराता है। इन्हीं से बुलंद इमारतें खड़ी होती हैं। इन्हीं पर प्लेटफॉर्म बनाकर अरब देश तेल निकाल कर अरबों रुपये कमाते हैं। गड्ढा न होता तो अरब देशों की क्या बिसात? मतलब गड्ढे प्रगति-सूचक भी हैं!
एक शिकायतकर्ता ने तो शासन से माँग भी की थी कि सड़कें अमुक हेरोइन के गाल की तरह चिकनी और सपाट हों। गड्ढे सड़क के हों तो हमेशा शिकायती आवेदनों में होते हैं, किंतु किसी नायिका के गाल पर ये गड्ढे हों या पड़ जाएँ, तो लोग उनके प्रशंसक बनकर मर-मिटते हैं, दीवाने हो जाते हैं। इन्हें सामान्य भाषा में ‘डिंपल’ कहते हैं। मुफ़लिसों के गाल या चेहरे पर गड्ढे पड़ना कुपोषण या बीमारी का सूचक है, लेकिन पसंदीदा हेरोइन के चेहरे के गड्ढे चूमने को उसके प्रशंसक एक पैर पर खड़े रहते हैं।
इंजीनियर अक्सर गड्ढों से ही परेशान रहते हैं। भवन के ले-आउट में यदि तीन गड्ढे आउट हो गए, तो कॉलम खड़े करने में दिक्कत होती है; तब इन्हें फिर से खोदना पड़ता है। एक सीध के गड्ढे (Pits) विकास में सहायक होते हैं, किंतु बेतरतीब गड्ढे आम जीवन में संहारक होते हैं। सैनिकों के बैरक के ‘पिट्स’ उनके लिए प्राण-रक्षक होते हैं, जबकि आम धारणा है कि गड्ढे जानलेवा होते हैं।
मनुष्य के जीवन में अशिक्षा, निर्धनता और संस्कारहीनता का गड्ढा उम्र भर त्रासदायक है। डीज़ल और पेट्रोल के पिट्स तेलीय देशों के लिए सुकूनदायी होते हैं। इंसान गड्ढे के चक्कर में रसातल में चला जाता है, परंतु उसका मोह नहीं त्यागता। काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह और मत्सर का गड्ढा कभी नहीं भरता; महाज्ञानी, संत और साधु भी ऐन वक़्त पर इस गड्ढे में फिसलते देखे गए हैं।
