साहित्य में बाज़ारवाद

जून, 2026

vandnakhare
वंदना खरे
मुंबई, महाराष्ट्र

(कवयत्री परिचय: जीवन के रंग, संवेदनाओं के रंग आदि पुस्तकें और अनेक पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन
मैं बड़ी लेखिका नहीं,
बस सच लिखती हूँ—
और पूछती हूँ,
क्या साहित्य अभी भी ज़िंदा है,
या बिक चुका है?
कभी शब्द आग हुआ करते थे,
अब सजावट बन गए हैं…
कभी कविता आवाज़ थी,
अब सिर्फ़ दिखावट बन गई है…
सच कम लिखा जाता है,
जो बिके वही छपता है…
दर्द भी पैक होकर बिकता है,
विरोध भी “ट्रेंड” बनता है…
साहित्य अब सोच नहीं,
एक बाज़ार बन गया है—
जहाँ भाव नहीं,
बस “व्यूज़” गिने जाते हैं…
पर मैं चुप नहीं रहूँगी—
क्योंकि शब्द ज़िम्मेदारी हैं,
कोई प्रोडक्ट नहीं।
अगर शब्द डर जाएँ,
तो समाज सो जाता है…
हमें चमक नहीं, सच चाहिए—
हमें बाज़ार नहीं, आग चाहिए।
क्योंकि जिस दिन साहित्य बिकने लगे,
उस दिन सच खो जाता है—
और कविता
सिर्फ़ कारोबार बनकर रह जाती है।
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