दिसंबर, 2025

हैदराबाद, तेलंगना
हर एक शब् की तासीर तो तीरगी ही है
फिर चाहे, तीरगी मद्धम हो या मुकम्मल
ख़ुदा ही जाने, कितनी रातें और बाकी हैं
मेरे ज़हन में ख़याल ख़्वाबों का आता है
रातों और ख़्वाबों में क़रार हुआ ही नहीं
किस रात के हिस्से में कितने ख्व़ाब हैं?
रातों को अपने हिस्से के ख्व़ाब चुनने हैं
एक आवारा सा ख़याल चला आया है
मुझको तो रातें नहीं, ख्व़ाब अज़ीज़ हैं
रात गुज़री, सुबह हुई, सूरज काला था
ज़माने का वो पैने कोने वाला एक सवाल
जैसे ख़ूबसूरत लिबास में लिपटा हुआ था
हमेशा की तरह तंज़ से लबरेज़ वो नश्तर
किसी ने यूं ही मुझ से पूछ लिया
अब क्या बच गया है, ज़िंदगी में
सुहास ने सरगोशी में जवाब दिया
बस एक ख़ला, ”वजूद की रिहाईश”
(शब्=रात, तीरगी=अंधकार, मुकम्मल=पूर्ण, मुसलसल=अनवरत, नश्तर= चाकू, ख़ला= खाली स्थान)
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