जून, 2024

नोएडा, उत्तर प्रदेश
किसे कहूं सुनेगा कौन?
किसे समझाऊं समझेगा कौन?
तड़प रहे हैं स्वार्थ की व्यथाओं में
जल रहे है द्वेष की ज्वालाओं में॥
दृष्टि दोष दूर की, निकट दृष्टि कमजोर है।
आंख पर पट्टी है गुरूर की हम तो बेजोड़ हैं॥
कोई सिसक रहा है अतीत की यादों में
कोई मदमस्त है वर्तमान की फरियादों मे
सत्य भटक रहा है असत्य की बागों में
अनुशासन नजर पड़ी कमजोर अभागों में
शहर हुआ आबाद सूनी आम की डाली
हरे भरे घासों बीच द्वार लगा ताली॥
इक्का दुक्का वृद्ध दिखें गांव की राहो में
आक्रोश छलक उठा दर्द भरी आंखों में॥
शहरी का भी दर्द है अपना
अल्प वेतन खर्च दुगुना॥
चाहते तो है आना पर आ नहीं पाते हैं।
अपना दर्द दर्शा नहीं पाते हैं॥
गांव का आक्रोश अपना
शहर का कुछ और सपना॥
बढ़ती महंगाई ने दम किया नाकों में
इच्छाएं दब गई आग लगी आशाओं में॥
दोनों दर्दों के बीच पुल अब बनाना है
मुक्त हो वेदना से, ममत्व को सहलाना है॥
आखिर वे भी तो सपने संजोए थे
दिवा चैन रैन निंद खोए थे॥
भूखे रह खुद हमें खिलाए थे॥
याद है वह लोरी
झूला की डोरी॥
मेरे राजकुमार
होके रथ पर सवार॥
हर लेंगे दर्द हमार॥
उम्मीद में सब हमें दिए
खुद दर्द का घूंट पिए॥
व्यथा किसी को बता ना पाते हैं
खुद के सपनों से खुद शरमाते हैं॥
अटक गई दिल की बात कटती न रात
छूट गए अब साथ भरे थे जो गात॥
याद दिलाता हर कोना
नींद से उठते सुन रोना॥
आंगन दलान सुन पड़ा, सुनी है बारी
रसोई में घिरा सन्नाटा सुख गई थारी॥
दिल से सुनना और सुनाना है
स्नेह प्रेम से उन्हें गले लगाना है॥
आखिर वक्त हीं कितना है उनके पास
फिर भी जीने की आश॥
अंत समय सुखद बनाकर
उनको सुख पहुंचाना है॥
जीवन के इस अमूल्य धरोहर को हमें बचाना है।
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