सोशल में खोई तरुणाई (गीत)

जून, 2026

rakesh chakra
डॉ राकेश चक्र
शिवपुरी, मुरादाबाद उ.प्र

मन मासूम भटकता फिरता,
और भावनाएँ कुम्हलाईं।
बचपन ने बचपन है खोया,
सोशल में खोई तरुणाई।।

मोबाइल वात्सल्य छीनकर,
भाग रहा है सरपट जी।
ओवरकोट पहन आडंबर,
नई ले रहा करवट जी।

फास्ट फूड खा फास्ट हो गए,
खुद ने खुद की पीर बढ़ाई।।

टीवी, मोबाइल में उलझे,
कुछ बनने की होड़ लगी।
महापुरुष आदर्श न अब तो,
बेमतलब की दौड़ लगी।

पंख लगा ममता उड़ती है,
कहाँ गईं अब दादी-ताई।।

इंटरनेट लगा दुनिया के,
सपने रंग-रँगीले दीखें।
धैर्य, सुकूँन हुए छूमंतर,
तनिक बात पर तन-मन खीझें।

अफरा-तफरी मची घरों में,
बजे ना घर में अब शहनाई।।
*****

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