जून, 2026

विरासत की झोली में कभी संस्कार उगते थे,
आज उसी झोली में दस्तख़त खोजे जाते हैं।
कल जिन बड़ों के फैसलों से घर चलते थे,
आज वही ‘हस्तक्षेप’ कहकर चुप कराए जाते हैं।
मोबाइल की चमक में रिश्ते धूमिल हो गए,
आँगन सूना पड़ा— स्मृतियाँ बेघर हो गईं।
जो छाँव थे पीढ़ियों की तपती धूप में,
आज उन्हीं पर धूप सबसे पहले गिर गई।
बुढ़ापे की लाठी बनने को कोई नहीं,
पर लाठी छीनने को सब तैयार हैं।
साँसें उधार चल रही हैं बुज़ुर्गों की,
औलादें हिसाब में पूरी ईमानदार हैं।
दीवारें अब सुनती नहीं,
आँखें सवाल करना भूल चुकी हैं।
काँपते होंठों पर जो शब्द मर गए,
वही शब्द हमें इंसान होने से रोक चुके हैं।
कब गिर पड़े यह जर्जर ढाँचा—
इसकी किसी को चिंता नहीं,
चिंता बस इतनी है
कि गिरते समय आवाज़ न करे।
बेटा–बहू–नाती–पोते
अपने ‘सफल’ संसार में व्यस्त हैं,
और एक ज़िंदा देह
घर के कोने में
अनावश्यक फ़ाइल बन चुकी है।
विवशता की चादर ओढ़े
ठूँठ बना यह वृक्ष,
ना फल का काम, ना छाया का—
बस जगह घेरने का दोषी है।
बंद कोठरी से टकराकर
कहराती आवाज़
लहूलुहान होकर गिरती है—
क्योंकि यहाँ बुढ़ापा
सुनने योग्य नहीं,
सिर्फ़ सहने योग्य समझा जाता है।
अंतिम प्रहार:
मरती वृद्धावस्था नहीं,
मर रहा है हमारा मनुष्य होना।
बुज़ुर्ग बोझ नहीं हैं—
बोझ वह समाज है
जो अपने कल को
आज ही दफ़नाने को व्याकुल है।
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