अपनों के बिन (गीत)

जून, 2026

अशोक आनन
मक्सी, जिला – शाजापुर (म.प्र.)

गुज़ारे न गुज़रे दिन-
अपनों के बिन।

परायों की भीड़ कभी छॅंटी न।
अपनों में वह कभी बॅंटी न।
अपनत्व की बारिश हम करते रहे;
ज़िंदगी उनके संग कभी कटी न।
चुभे अकेलेपन के पिन-
अपनों के बिन।

पर्व आये, पर्व गये, फ़िर आये।
ख़ुशियाँ परायों- संग मना न पाये।
औपचारिकताओं का निबाह किया;
दिल से रस्म कोई भी निभा न पाये।
अपने अपनों को पाये न चीन्ह-
अपनों के बिन।

संस्कार बच्चों से अब दूर ही रहे।
अहंकार में सदा वो चूर ही रहे।
प्यार होता पास तो प्यार वो बाँटते;
अपनों के प्रति वो सदा क्रूर ही रहे।
अपनों से उन्हें आती है घिन-
अपनों के बिन।

दादी की वारता वो नानी के किस्से।
आये नहीं ज़रा भी बच्चों के हिस्से।
यह पीड़ा है उनकी वर्तमान सदी की
वक़्त है बहरा पीड़ा कहें वे किससे।
मन ही मन घर है सारा खिन्न-
अपनों के बिन।
*****

यह भी पढ़ें  ग़ज़लें

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top