दिसंबर, 2025

(कवि परिचय: शिक्षा से यांत्रिक अभियन्ता, सेवानिवृत आईएसएस एवं आईआरएसएस अधिकारी, वर्तमान में अनेक विभागों में मध्यस्थ (arbitrator) और सलाहकार। आभिरुचि से स्वच्छंद लेखन और पर्यटक।)
नीलिमा आकाश की ओढ़े हुए
लिपट धरती पर कुहासे में पड़े,
डाल पर पत्तों की झुरमुट में खड़े
यह गुलाबी रंग है बोझिल हुई
पंखुड़ी थी एक जो वह खिल गई
डालियाँ है मचलती अब
हरित पौधे उछलती अब
हर तने पर मंजरी है
सिहकती बहती हवा से मिल गई है
पंखुड़ी थी एक———–
रूप का सौन्दर्य लेकर,
प्रस्फुटित ऐश्वर्य लेकर
अर्थ जीने का तलाशे
ईश पर निज शीश देकर हिल गई है
पंखुड़ी थी एक————–
सृष्टि की संभावना से
दृष्टि की अवधारणा से
भाव विशाल भावना से
थाल पूजा के सम्हाले
भक्त के दिल बस गई है
पंखुड़ी थी एक———–
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