दिसंबर, 2025

हो प्रबल इच्छा न कुछ दु:साध्य है।
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य है।।
फूँक पावन शंख शिव संकल्प ले
जब चलेंगी उंगलियां कर्तव्य की
कामना के चित्र को जीवंत कर
खींच देंगी रेख नव भवितव्य की
कर्म पूजा – प्रार्थना -आराध्य है
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य है
है सुनिश्चित लक्ष्य तो फिर क्यूँ भला
मन भटकता वृक्ष, पत्ती, शाख पर
दृष्टि कुन्तीपुत्र जैसी चाहिए
जो टिकी हो मात्र खग की आँख पर
नीतिगत हो रीति तो स्वीकार्य है
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य है।
हमने देखा इक अकेला बावला
तोड़ने विकराल पर्वत चल पड़ा
प्राणपण से चीर गिरि के वक्ष को
कर लिया निर्माण अभिनव राह का
ठान लें तो कुछ नहीं दुष्प्राप्य है
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य है।
चाहते गंतव्य तक जाना अगर
क्यों उलझना झाड़ औ झंखाड़ से
मोड़ लेती है नदी निज धार को
ठानती क्या रार मूढ़ पहाड़ से?
सुकृतियाँ सन्मार्ग पर सम्भाव्य है
आज का पुरुषार्थ कल का भाग्य है।
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