संधिपत्र

दिसंबर, 2025

dr manju rustagi
डॉ. मंजु रुस्तगी
चेन्नई

जरा और यौवन के
संधिपत्र पर
वक्त करता है जब
हस्ताक्षर…
तो होता है घटित
कभी संकुचन, कभी प्रस्फुटन,
कभी निश्चिंतता, कभी असमंजन।
तिराहे पर खड़ी ज़िंदगी
बात करना चाहती है
ठहरे हुए लम्हों से
पर आज…
कहाँ देता है मोहलत
एकाकी भविष्य खींचता अपनी ओर
इसी कल-आज की ऊहापोह में
मन का थकता पोर-पोर।

न अगन बची, न स्वप्न बचे
मानो छूटे जाते दोनों छोर।
टूटती शाखें और झरते फूल
भिगो जाते आँखों के कोर।
मन रहता चिंतित कभी-कभी
क्या देख पाऊँगा कल की भोर?

इसी आस-निरास के झूले पर
दिल हर दिन पींगे भरता है,
सुबह रश्मियों के झुरमुट में
हर दिन बोनस सा लगता है।
जो दे जाती संदेश यही कि
हर पल का आनंद उठाओ,
परहित में स्वयं को करो समर्पित,
मर कर भी तुम जी जाओ।
*****

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