दिसंबर, 2025

सहेजता हूँ रोज़ कुछ ख़्वाबों को,
टूटता हूँ फिर भी चुप रहता हूँ।
पढ़ाई का बोझ, नौकरी की थकान,
ज़िंदगी से रोज़ जूझता रहता हूँ।
घर की उम्मीद, माँ-बाप की दुआ,
हर तरफ़ से खुद को खींचता रहता हूँ।
हँसी मेरी अब नक़ाब बन चुकी है,
ग़म छुपाकर हर दिन जीता रहता हूँ।
इज़्ज़त, वफ़ा, ज़िम्मेदारी की ज़ंजीरें,
इनके बीच खुद को भूलता जाता हूँ।
कोई पूछे तो कह देता हूँ “ठीक हूँ”,
पर अंदर से हर रोज़ बिखरता जाता हूँ।
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