याददाश्त (मनोभ्रंश: एक सिसकती ज़िंदगी)

दिसंबर, 2025

(कवयत्री परिचय: विदेश में रहते हुए भी देश की धरती और लोगों से आपका आत्मिक जुड़ाव, डॉक्टर होने के साथ-साथ मैथिली और हिन्दी भाषा में रचना, समाज सेवा, भाषा एवं लिपि के विकास, और संस्कृति के संरक्षण के लिए प्रयासरत हैं।)

dr vandna karn
डॉ वन्दना कर्ण
न्यूकैसल अपॉन टाइन, ब्रिटेन

यादों की भूलभुलैया में खो गई हूँ,
बच्चे हैं, पति हैं, पर
सब जैसे अनजान हो गए हैं।
बचपन की कहानियाँ मुझसे लिपटी हैं,
पर आज सुबह क्या खाया, याद नहीं है।

बच्चे समझ नहीं पाते,
क्यों एक ही बात बार-बार कहती हूँ,
दवा ली या नहीं,
क्यों बार-बार पूछती हूँ?

वो झल्लाते हैं,
क्योंकि वो मुझे अभी भी ‘माँ’ समझते हैं।
अगर हड्डी टूटती, तो सब देख पाते,
मगर टूटे हुए मन-मस्तिष्क के तार,
किसे दिखाऊँ, किसे समझाऊँ?

बुढ़ापा शरीर को कमजोर कर देता है,
मांसपेशियाँ थक जाती हैं,
पर दिल के तार तो यूँ ही जुड़े रहते हैं।
इच्छाएँ नहीं मरतीं,
मुझे भी दुनिया देखनी है,
बाहर जाना है, कभी बाहर खाना भी है।
पर कहूँ तो किससे कहूँ?

अब एक ही चाह है,
मुझे समझो न बोझ की तरह,
न मानो मुझे सिर्फ
एक जीवनहीन शरीर।

एक ही ज़िंदगी मिली है मुझे भी,
याददाश्त चली गई तो क्या हुआ,
सारी बुरी स्मृतियाँ साथ ले गई।
अब स्मृतियों की स्लेट खाली है,
मुझे इस खालीपन में अपनी ज़िंदगी जीने दो।

मेरे सपनों के तारों को
फिर से बुनने दो,
प्यार भरे वातावरण में
दिल की धड़कनों को महसूस होने दो।

मेरे हर शब्द में मत खोजो अर्थ,
रोक-टोक और सवालों के बिना,
बस मुझे जीने दो,
मुझे मेरे ख़्वाबों में पनपने दो।
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