सितंबर, 2025

फरीदाबाद
दिन दहाड़े हो गया, विश्वास का ही अपहरण
स्वार्थवादी नाग बैठे, डस रहा अब नारी तन
देखो पूर्णिमा के दिन, हो गया अमावस के घर
हे मेरे परमात्मा! अब तूँ ही कोई इंसाफ कर
आग जिनको थी बुझानी, वही लगाते आग हैं
चीखती है नारियाँ, और गा रहा कोई फाग है
मीठे-मीठे सपनों पर, मिला रहा दानव ज़हर
हे मेरे परमात्मा! अब तूँ ही कोई इंसाफ कर
क्या बूढ़ी क्या नवेली, दूधमुंही भी बिलख रही
मनुष्यता के भाल पर, कलंक की शाप लग रही
क्या कहूँ किससे कहूँ, है कठिन मेरा सफ़र
हे मेरे परमात्मा! अब तूँ ही कोई इंसाफ कर
सिसक रही है धीर धरा, हो रही अधीर है
हो सके तो रोक ले, सहन नहीं अब पीर हैं
शांति की लाली प्रखर, उतरेगी पूण्य भूमिपर
हे मेरे परमात्मा! अब तूँ ही कोई इंसाफ कर
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