सितंबर, 2025

शिक्षाविद एवं साहित्यकार
गुरुग्राम, हरियाणा
ख़ून की बूँदों से भीगी ज़मीं,
जहाँ कभी बचपन दौड़ा था कहीं।
अब खामोशी काँप रही थी,
दीवारें भी बगले झांक रही थीं।
हाथों में छोटा गीला बीज था,
आँखों में रोशन एक ताज महल था।
दंगे ने दोस्त छीन लिया,
पर उम्मीद अब भी जी रही थी।
“क्या कर रहे हो यहाँ?” पूछा वर्दी ने।
बच्चा बोला –
“यह अमन का बीज है,
इसे रोशन होना है, वहाँ –
जहाँ अब अँधेरा बोया गया है!”
मिट्टी में न नफ़रत थी, न मज़हब,
सिर्फ एक कोना था –
जहाँ दोस्ती ने चुपचाप सिर झुकाया था।
हिंसा न भाषण से जन्मी थी,
न किसी किताब से निकली थी।
हिंसा का कारण था – मौन,
जहाँ इंसान को इंसान ने डराया।
और निवारण?
वो इस नन्हे हाथ में था-
जो मिट्टी में बीज नहीं,
भरोसा बो रहा था
नफरत बाँटने वालों से लड़ना हो तो,
बच्चों को दोस्ती सिखाइए।
किताबों में सिर्फ नाम मत पढ़ाइए,
एक-दूजे के दर्द भी सुनाइए।
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