मार्च, 2024

प्रवक्ता संस्कृत
जानकी विहार कॉलोनी, जानकी पुरम्, लखनऊ
चाव से सजाया निज आँगन वसुंधरा ने,
जान घर आज अब ऋतुराज आये हैं।
बैठा डालियों पे छिप गाने जो विहंग लगे,
लगता समस्त पादपों ने स्वर पाये हैं।
पवन झकोर से गिरे जो भूमि पे हैं पुष्प,
प्रकृति नटी ने मानों पावड़े बिछाये हैं।
प्रमुदित हो के सभी सुमन शृंगार करें,
अलि पंक्तियों में दृग अंजन लगाये हैं। (घनाक्षरी छन्द)
पेड़ों में है हरियाली बसी,
अलि प्रेम के गीत सुना रहे हैं।
कूकती कोकिला है वनों में,
शुक-सारिका के संग गा रहे हैं।
भू ने शृंगार अनूप किया,
जल जात पराग लुटा रहे हैं।
स्वागत में ऋतुराज के आज,
ये साज प्रसून सजा रहे हैं। (सवैया छन्द)
