मार्च, 2024

वैशाली, गाजियाबाद, यूपी
कहां खोई?
क्या ढूंढ रही?
तुम किन बातों से
टूट रही?
खिलखिलाओ जैसे अमलतास!
लो आ गया मैं,
तुम्हारा अपना मधुमास!
रस भरे नैन
क्यों हैं धूमिल?
कहां गईं आंखें
ख़्वाबिदा स्वप्निल?
अन्तस में भर लो
आसमान भर उजास!
लो आ गया मैं,
तुम्हारा अपना मधुमास!
पतझड़ के दिन बीत गए,
फिर से बिखराओ
अपनी मुस्कान,
बहारों को उतारो
आंचल में,
हो जाओ नटखट शैतान!
संबल बन के खुद का,
गहरे तक भर लो सांस!
लो आ गया मैं
तुम्हारा अपना मधुमास!
तितली से रंग चुरा लो ना,
परिंदे के पर लगा लो ना,
पलाश के लाल रंग से
अपने कपोल दहका लो ना,
तुम सुकुमारी,
प्रकृति की प्यारी
मेरे लिए हो ख़ास!
लो आ गया मैं,
तुम्हारा अपना मधुमास!
सालों से घोलती आई हो
बसंत के बयार में तुम सरगम,
सदियों से रोपती आई हो
बसंत की जड़ों में तुम यौवन,
जन्मों से है मुझको
बस तुम्हारी ही तलाश!
लो आ गया मैं,
तुम्हारा अपना मधुमास!
