सितंबर, 2025

व्याख्याता- दिल्ली विश्वविद्यालय
दिल्ली
वरिष्ठ हूँ मैं
बचपन से बुढ़ापा
सोलह संस्कार की गाथा
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष
और तथाता
सबका ध्याता
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ
संन्यास की ओर उन्मुख
फिर भी जीवन से है आस
लालसा से नहीं हो पा रहा विमुख
क्योंकि सोशल मीडिया ने मुझे
बना दिया ज़िंदादिल और
हंसमुख
नवजीवन का है संचार
हर ओर, हर मुख
मोबाइल, आइपैड और लैपटॉप
पर थरथराती और कांपती
मेरी उंगलियाँ
जोड़ती मुझे
जमीन से आसमान
और
गाँव से ग्लोब तक
भरती मुझमें नवजीवन
की एक नई जान
एक नई तान
कभी फेसबुक, कभी व्हाट्सएप
कभी इंस्टाग्राम, तो कभी लिंक्डइन
मेरे अंधेरे को दूर
उजाले की ओर ले जाती अंतहीन
और मेरी अंतर्दृष्टि हो जाती सुदूर
अब तो आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस
ने कर दिया मेरे थके शरीर को
झंकृत
स्क्रीन पर
मैं जो सोंचू वो पाऊँ
कभी गाऊँ, तो कभी मुस्कुराऊँ
और जीवन का आनंद उठाऊँ
मैं वरिष्ठ हूँ लेकिन लाचार नहीं
अभी भी योग से प्राप्त करता हूँ
भक्ति, कर्म और ज्ञान
का सतरंगी प्रकाश
अपने आत्मसम्मान
से
पाता हूँ अपनापन
मान-सम्मान
वात्सल्य और ममत्व
से परिपूर्ण
परिवार के शीर्ष पर खड़ा
आशीर्वाद का हूँ मैं
भंडार
मैं साँझ का दीप
मेरा एक ही ध्येय
अत्त दीपो भव
मुझे और क्या चाहिए
बस प्यारे परिवार की छाँव
बस छाँव
क्योंकि मैं हूँ प्रतीक
ए आई (AI) के नवजीवन का।
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